काशी हिंदू विश्वविद्यालय का गेट सिर्फ एक विश्वविद्यालय का प्रवेश द्वार नहीं है

Archana Ekka
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काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) का गेट सिर्फ एक विश्वविद्यालय का प्रवेश द्वार नहीं है। वह एक ऐसी अदृश्य सीमा रेखा है, जिसके भीतर जाते ही आधुनिक दुनिया का ‘टाइम ज़ोन’ बदल जाता है। बाहर लंका पर गाड़ियों का कानफोड़ू भोंपू बज रहा होता है, और भीतर घुसते ही महामना मदन मोहन मालवीय की प्रतिमा देखकर ऐसा लगता है जैसे समय ने अचानक ब्रेक मार दिया हो।

प्रोफेसर त्रिलोकीनाथ दुबे इसी विश्वविद्यालय में ‘तुलनात्मक दर्शन और मानव चेतना’ के विभागाध्यक्ष थे। विभागाध्यक्ष का पद उन्हें पिछले साल ही मिला था, जिसके बाद से उनके सफेद कुर्ते की कड़क और उनके चलने की रफ़्तार में पंद्रह प्रतिशत की वृद्धि हो गई थी। दुबे जी का मानना था कि दुनिया का सारा दर्शन ग्रीस और जर्मनी में सिर्फ पैदा हुआ था, लेकिन बड़ा वह बनारस की गलियों में ही हुआ।

धूप ऐसी थी कि अगर कोई लंका गेट पर सड़क पर अंडा फोड़ दे, तो दो मिनट में ऑमलेट बन जाए। लेकिन दुबे जी को धूप से क्या लेना-देना? वह अपने खास गंतव्य—पप्पू की चाय दुकान की तरफ बढ़ रहे थे। यह दुकान बीएचयू के बुद्धिजीवियों का वह ‘थिंक टैंक’ थी, जहां प्रधानमंत्री से लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति तक की नीतियां बिना उनकी अनुमति के बदल दी जाती थीं।
“अरे गुरु! चाय में चीनी जरा कम रखना, और ज्ञान की पत्ती थोड़ी कड़क!” दुबे जी ने अपनी चिरपरिचित आवाज में कहा और लकड़ी के बेंच पर अपनी मखमली तोंद को संभालते हुए बैठ गए।

उनके सामने पहले से ही लल्लन महाराज विराजमान थे। लल्लन जी बनारस के स्वघोषित ‘राजनीतिक चाणक्य’ और अंशकालिक प्रॉपर्टी डीलर थे। वह चुनाव किसी भी पार्टी का हो, हारने वाले उम्मीदवार का घोषणापत्र और भाषण खुद लिखते थे। उनका दावा था कि जीतने वाले को तो जनता जिताती है, लेकिन हारने वाले को सम्मान से हराना एक कला है, जो सिर्फ उनके पास है।

“दुबे जी, प्रणाम!” लल्लन ने मुंह में दबा जर्दा एक तरफ खिसकाते हुए कहा। “सुना है इस बार विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर (वीसी) साहब का झुकाव समाजवाद की तरफ कुछ ज्यादा ही बढ़ रहा है? कल शाम को कमिश्नरी में किसी वामपंथी लेखक की किताब का विमोचन कर रहे थे।” दुबे जी ने तिरछी नजर से लल्लन को देखा। उन्होंने कुल्हड़ को होंठों से लगाया, एक लंबी सुसकारी भरी, और बोले, “धुर्र बुड़बक! तुम राजनीति का ककहरा भी नहीं जानते लल्लन। वीसी साहब का झुकाव न समाजवाद की तरफ है, न दक्षिणपंथ की तरफ। उनका झुकाव सिर्फ और सिर्फ अपनी कुर्सी की तरफ है।

वह तो योग दिवस पर अनुलोम-विलोम भी इस तरह करते हैं जैसे दिल्ली दरबार को रील्स बनाकर भेज रहे हों कि देखो—’हम सांस भी राष्ट्रहित में छोड़ रहे हैं’।”चाय की दुकान पर बैठे अन्य चार प्रोफेसरों ने इस बात पर टेबल थपथपाकर सहमति जताई।  तभी सड़क के बीचों-बीच से एक विशाल सफेद सांड, जिसे स्थानीय भाषा में ‘बाबा का सांड’ कहा जाता था, अत्यंत वीआईपी गति से दुकान की तरफ बढ़ा। उसने बिना किसी औपचारिकता के लल्लन जी के हाथ से सुबह का अखबार छीन लिया। बनारस में सांड भी साक्षर और राजनीतिक रूप से जागरूक माने जाते हैं। वह पूरा अखबार नहीं चबाते थे, केवल संपादकीय पन्ना और स्थानीय अपराधों की खबरें ही उनका मुख्य आहार थीं।

लल्लन जी ने बिना गुस्साए कहा, “लीजिए, बाबा का बुलावा आ गया। आज का संपादकीय वैसे भी थोड़ा रूखा था, सांड जी को हजम करने में समय लगेगा। “दोपहर ढलते-ढलते दुबे जी बीएचयू के अपने केबिन से निकले और सीधे अस्सी घाट की तरफ  रुख किया। बनारस की गर्मी में अगर कहीं थोड़ी शांति मिल सकती थी, तो वह गंगा की लहरों से आने वाली हवा में थी। घाट की सीढ़ियों पर बैठते ही दुबे जी को उनका प्रिय और सबसे पुराना शोध छात्र पिंटू मिल गया। पिंटू पिछले सात साल से बीएचयू से पीएचडी कर रहा था। उसका विषय बेहद गंभीर था: ‘काशी के मणिकर्णिका घाट पर वैराग्य की उत्पत्ति और उसका वैश्विक पर्यटन पर आर्थिक प्रभाव’। सात साल में पिंटू का शोध तो पूरा नहीं हुआ, लेकिन वह खुद अस्सी घाट का एक जीवंत टूरिस्ट गाइड जरूर बन चुका था।

“प्रणाम गुरु जी!” पिंटू ने लपककर दुबे जी के पैर छुए। “गुरु जी, आज एक बहुत तगड़ा मुर्गा… मेरा मतलब है, एक विदेशी शोधार्थी फंसा है। सुबह से मोक्ष ढूंढ रहा है। मैंने उसे आपकी किताबों के बारे में बताया, तो वह साक्षात दर्शन के लिए तड़प उठा।” दुबे जी ने अपनी चश्मा ठीक किया। सामने एक गोरा सैलानी, जिसका नाम शायद ‘मार्क’ था लेकिन पिंटू उसे ‘मक्खन सिंह’ बुलाता था, भगवा कुर्ता और ढीला ढाला पाजामा पहने बैठा था। उसके गले में रुद्राक्ष की इतनी भारी माला थी कि उसकी गर्दन थोड़ी आगे की तरफ झुकी हुई थी। वह अपने आईफोन से गंगा जी की रील्स बना रहा था, जिसका कैप्शन था— ‘फाइंडिंग इनर पीस एंड वाइब्रेशनल कॉस्मिक एनर्जी इन बनारस

दुबे जी उसके पास जाकर बैठ गए। “यस माय सन! यू वांट साल्वेशन? मोक्ष चाहिए तुमको?”
मार्क ने श्रद्धाभाव से सिर हिलाया, “यस स्वामी जी! आई वांट टू एस्केप दिस मैटेरियलिस्टिक वर्ल्ड। आई वांट परमानेंट पीस।”
दुबे जी ने एक गंभीर दार्शनिक की तरह अपनी दाढ़ी सहलाई और मुस्कुराते हुए बोले, “देखो बाबू मक्खन! मोक्ष का कोई ऑनलाइन डाउनलोड लिंक नहीं है कि क्लिक किया और मिल गया। बनारस में मोक्ष का अपना एक प्रोटोकॉल है। इसके लिए तुम्हें कठिन तपस्या करनी होगी।” मार्क ने तुरंत अपनी डायरी और पेन निकाल लिया। उसे लगा कि अब कोई गुप्त अघोरी मंत्र मिलने वाला है।

दुबे जी ने आगे कहा, “सबसे पहले कल सुबह चार बजे उठो। दशाश्वमेध घाट जाओ। वहां संकल्प लो। उसके बाद, ठीक दोपहर बारह बजे, जब सबसे ज्यादा भीड़ हो, तुम गोदौलिया चौराहे पर जाओ। वहां बिना किसी ट्रैफिक नियम के, बिना किसी की गाड़ी से टकराए, और बिना किसी ऑटो वाले की गाली खाए, सड़क के इस पार से उस पार जाकर दिखाओ। अगर तुम वहां सकुशल और बिना मानसिक संतुलन खोए पार हो गए, तो समझो तुम्हें जीते जी मोक्ष मिल गया। बनारस का ट्रैफिक ही इस ब्रह्मांड की सबसे बड़ी माया है। जिसने इसे पार कर लिया, उसे यमराज भी नहीं रोक सकते।”

मार्क ने पूरी बात बहुत ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण से डायरी में नोट कर ली। उसे लगा कि गोदौलिया चौराहा शायद चक्रों को जाग्रत करने का कोई प्राचीन ज्यामितीय केंद्र (Geometric Center) है। पिंटू ने बगल में बैठकर अपनी हंसी दबाने के लिए मुंह पर हाथ रख लिया। शाम होते ही बनारस का असली मिजाज खुलता है। यह वह समय होता है जब शहर के सारे बुद्धिजीवी, नेता, छात्र और ठगे गए लोग अपनी-अपनी अदालतों को सजाते हैं। दुबे जी और लल्लन महाराज की शाम की अदालत गोदौलिया के प्रसिद्ध ‘चौरसिया चुलबुल’ पान भंडार पर लगती थी। बनारस में पान सिर्फ एक माउथ फ्रेशनर या मुंह मीठा करने की चीज नहीं है। यह एक सुप्रीम कोर्ट है, जहां समाज के हर छोटे-बड़े मुद्दे पर अंतिम और गैर-अपीलीय फैसला सुनाया जाता है।

“गुरु, एक बनारसी पत्ता मारो। कत्था कड़ा रखना, चूना जरा संभलकर, और जर्दा… थोड़ा सा ऐसा देना कि दिमाग के बंद पड़े न्यूरॉन्स अचानक नाचने लगें,” दुबे जी ने चौरसिया जी को आदेश दिया। चौरसिया जी पान लगाने की कला के साक्षात उस्ताद थे। उन्होंने पीतल के बर्तन से कत्था निकाला और हवा में हाथ को इस तरह लहराया जैसे कोई कथक नर्तक मुद्रा बना रहा हो। कत्थे और चूने का मिश्रण पत्तों पर ऐसे गिरा जैसे कोई चित्रकार कैनवास पर अपनी अंतिम कृति बना रहा हो।

पान जैसे ही दुबे जी के मुंह में गया, उनकी आंखें कुछ पलों के लिए बंद हो गईं। जर्दे की पहली तरंग जब उनके मस्तिष्क से टकराई, तो उन्हें लगा कि जैसे उन्होंने एक ही पल में क्वांटम फिजिक्स और आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत को एक साथ समझ लिया है। “हां, तो लल्लन! तुम क्या कह रहे थे कि अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में रिपब्लिकन्स का पलड़ा भारी है?” दुबे जी ने मुंह में पान दबाने के कारण अत्यंत दबी हुई और भारी आवाज में पूछा। बनारस में पान खाकर बात करने की एक विशेष विधा है, जिसमें बिना थूक बाहर निकाले, शब्दों को बिल्कुल स्पष्ट बोलना होता है।

लल्लन ने भी अपना पान चबाते हुए कहा, “जी गुरु, न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट तो यही कह रही है।” “धुर्र बुड़बक!” दुबे जी ने हवा में हाथ नचाया। “न्यूयॉर्क टाइम्स वाले कभी गोदौलिया की इस दुकान पर आकर चाय पीए हैं? उन्हें क्या पता! अरे, व्हाइट हाउस में चाहे जो बैठे, चाहे वो गधा हो या घोड़ा, लेकिन दुनिया की असली कूटनीति तो इसी काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के बाहर की गलियों से तय होती है। तुम देखना, वहां जो भी जीतेगा, उसे अंत में आकर दशाश्वमेध घाट पर आरती ही देखनी पड़ेगी। सब माया है, असली केंद्र यहीं है।”

तभी वहां से बीएचयू छात्र संघ के एक पूर्व नेता जी अपनी बुलेट मोटर साइकिल पर पटाखा छोड़ते हुए गुजरे। नेता जी के कुर्ते पर ‘भावी प्रत्याशी’ का स्टिकर लगा हुआ था। उन्हें देखकर दुबे जी ने कहा, “इन लड़कों को देखो। पढ़ाई-लिखाई से इनका कोई नाता नहीं है, लेकिन बनारस की राजनीति में इन्हें सीधे चाणक्य का अगला अवतार बनना है। बीएचयू में एडमिशन इसलिए लेते हैं ताकि हॉस्टल का कमरा सात साल तक खाली न करना पड़े।” अगले दिन बीएचयू के कला संकाय में सेमेस्टर परीक्षा थी। प्रोफेसर दुबे जी की ड्यूटी परीक्षा हॉल नंबर ३ में इनविजिलेटर (निरीक्षक) के रूप में लगी थी। हॉल का दृश्य किसी युद्ध क्षेत्र जैसा था, जहां छात्र अपने-अपने हथियारों (पेन, स्केल और दिमाग) के साथ बैठे थे। कुछ छात्र तो डेस्क पर सिर रखे इस तरह सो रहे थे जैसे परीक्षा देकर वह देश पर कोई बहुत बड़ा उपकार कर रहे हों।

दुबे जी हॉल की सीढ़ियों पर धीरे-धीरे टहल रहे थे। उनकी नजर अंतिम बेंच पर बैठे एक छात्र पर पड़ी। उसका नाम मोंटू था, जो हॉस्टल का एक नामी गिरामी ‘बाहुबली’ छात्र था। मोंटू अपनी बाईं हथेली को बहुत ध्यान से देख रहा था और दाहिने हाथ से उत्तर पुस्तिका भर रहा था। दुबे जी बिल्ली जैसी खामोश चाल से उसके पीछे जाकर खड़े हो गए। उन्होंने देखा कि मोंटू की हथेली पर नीली स्याही से अत्यंत बारीक अक्षरों में ‘ऋग्वेद के दसवें मंडल की संपूर्ण व्याख्या’ लिखी हुई थी। फॉन्ट साइज इतना छोटा था कि माइक्रोसॉफ्ट वर्ड भी शरमा जाए। “क्या चल रहा है यह मोंटू जी?” दुबे जी ने उसके कान के पास जाकर कड़क कर पूछा।

मोंटू ने बिना घबराए, अत्यंत शांत भाव से हाथ जोड़ लिए। उसके चेहरे पर अपराधी होने का एक भी भाव नहीं था, बल्कि एक बनारसी शालीनता थी। “अरे गुरु जी! प्रणाम। आप गलत समझ रहे हैं। यह कोई नकल-वकल नहीं है। यह तो परीक्षा के इस भयानक मानसिक तनाव को कम करने के लिए मैं ‘हस्तरेखा विज्ञान’ और ‘प्राचीन ज्योतिष’ का व्यावहारिक प्रयोग कर रहा था,” मोंटू ने पूरी ईमानदारी से कहा। दुबे जी ने उसकी हथेली को हाथ में लिया, चश्मा नाक पर टिकाया और बोले, “अच्छा? हस्तरेखा विज्ञान? और इस विज्ञान में यह जो लिखा है कि ‘ऋग्वेद के अनुसार पुरुष सूक्त की व्याख्या करें’, यह तुम्हारी किस जीवन रेखा का हिस्सा है भाई?” हॉल के बाकी छात्र अपनी हंसी रोकने के लिए अपने गाल चबाने लगे। मोंटू ने मुस्कुराते हुए कहा, “गुरु जी, काशी की धरती पर साक्षात ज्ञान बहता है। अब रेखाओं में ही वेद लिखे हों, तो इसमें एक तुच्छ छात्र क्या कर सकता है?”

दुबे जी अंदर ही अंदर उसकी हाजिरजवाबी के कायल हो गए। उन्होंने उसकी पीठ पर धीरे से एक धौल जमाई और बोले, “बनारसी हो गुरु! कला तो कूट-कूट कर भरी है। पर सुनो, अगली बार ज्योतिष का यह प्रयोग जरा कम फॉन्ट साइज में करना, नहीं तो परीक्षा नियंत्रक तुम्हारी भाग्य रेखा हमेशा के लिए मिटा देंगे। चलो, अब इसे चुपचाप मिटाओ और जो दिमाग में है, उसे लिखो।” शाम के सात बज चुके थे। पूरा बनारस अब घाटों की तरफ उमड़ पड़ा था। शंख की आवाजें हवा में गूंज रही थीं, डमरू बज रहे थे, और गंगा की लहरों पर दीयों की रोशनी ऐसे तैर रही थी जैसे आसमान के तारे जमीन पर उतर आए हों।
प्रोफेसर त्रिलोकीनाथ दुबे अस्सी घाट की सबसे ऊपरी सीढ़ी पर बैठे थे। उनके एक हाथ में पप्पू की दुकान वाली कड़क चाय का कुल्हड़ था, और मुंह में चौरसिया जी का वही ‘न्यूरॉन्स जगाने वाला’ पान दबा हुआ था। उनके बगल में लल्लन महाराज और पिंटू भी बैठे थे।

तभी भीड़ को चीरते हुए मार्क (मक्खन सिंह) दौड़ता हुआ आया। उसके कपड़े धूल से सने थे, बाल बिखरे हुए थे, और चेहरे पर एक अजीब सा, भयानक लेकिन दिव्य संतोष था। वह सीधे दुबे जी के पैरों में गिर पड़ा। “ओह स्वामी जी! आई डिड इट! आई डिड इट!” मार्क हांफते हुए चिल्लाया। “क्या हुआ बाबू मक्खन? गोदौलिया पार कर गए क्या?” दुबे जी ने चाय की सुसकारी लेते हुए पूछा। “यस स्वामी जी! मैं दोपहर को गोदौलिया गया। वहां छह ऑटो वाले, तीन सांड, दो ई-रिक्शा और एक पुलिस वाले के बीच से मैं बिना छुए निकल गया। जब मैं दूसरी तरफ पहुंचा, तो मेरे दिमाग का सारा ‘ईगो’ खत्म हो चुका था। मुझे लगा कि अगर मैं यहां बच सकता हूं, तो मैं इस ब्रह्मांड में कहीं भी बच सकता हूं। दिस इज रियल मोक्ष! मेरा पुनर्जन्म हो गया है!” मार्क की आंखों में आंसू थे।

दुबे जी ने लल्लन की तरफ देखा और फिर मार्क के सिर पर हाथ रखा। “देखा लल्लन, इसे कहते हैं व्यावहारिक दर्शनशास्त्र। जो काम बड़े-बड़े ग्रंथ नहीं कर पाए, वो हमारे गोदौलिया के ट्रैफिक ने दो मिनट में कर दिया।” घाट पर आरती की आवाज तेज हो गई— ‘जय शिव ओंकारा…’। चारों तरफ एक अलौकिक ऊर्जा फैल चुकी थी। दुबे जी ने आसमान की तरफ देखा, जहां धुएं और रोशनी के बीच महादेव का कोई अदृश्य रूप मुस्कुराता हुआ प्रतीत हो रहा था। उन्होंने कुल्हड़ की अंतिम बूंद को गले के नीचे उतारा और बुदबुदाए: “हे महादेव! यह दुनिया भले ही चांद और मंगल पर कॉलोनी बसा ले, सिलिकॉन वैली वाले भले ही इंसानों को रोबोट बना दें, लेकिन आत्मा को जो शांति इस दो रुपए के मिट्टी के कुल्हड़ की चाय, पांच रुपए के बनारसी पान और काशी की इन अल्हड़ गलियों में मिलती है… वह ब्रह्मांड के किसी कोने में नहीं मिलेगी। क्योंकि दुनिया चलती होगी कायदे से, लेकिन बनारस चलता है सिर्फ और सिर्फ अपनी लाट साहब वाली मौज से!”
लल्लन ने कहा, “बिल्कुल सत्य कहा गुरु! हर-हर महादेव!” और इसी के साथ अस्सी घाट पर एक और शाम बनारसी ठहाकों और गंगा की लहरों में विलीन हो गई।

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अर्चना एक्का को पत्रकारिता का दो वर्ष का अनुभव है। उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत इंटर्नशिप से की। इस दौरान उन्होंने झारखंड उजाला, सनमार्ग और इम्पैक्ट नेक्सस जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया। इन संस्थानों में उन्होंने रिपोर्टर, एंकर और कंटेंट राइटर के रूप में कार्य करते हुए न्यूज़ रिपोर्टिंग, एंकरिंग और कंटेंट लेखन का अनुभव प्राप्त किया। पत्रकारिता के क्षेत्र में वह सक्रिय रूप से काम करते हुए अपने अनुभव को लगातार आगे बढ़ा रही हैं।