
दयानंद राय
कुल जमा 48 बरस की उमर पायी थी उसने। तीन फिल्में निर्देशित की और सिर्फ एक फिल्म से यह साबित कर दिया कि काम के प्रति कैसा जुनून था उसमें। बात हो रही है काम को इबादत समझनेवाले के आसिफ की। ‘मुगल-ए-आजम’ का निर्देशक और निहायत उंचे दर्जे का कलाकार। के आसिफ ने फिल्म बनाने की ट्रेनिंग नहीं ली थी पर जिसके खून में फिल्में दौड़ती-भागती हों उसे ट्रेनिंग लेने की क्या जरुरत। ‘मुगल-ए-आजम’ भारतीय सिने इतिहास की उन चुनिंदा फिल्मों में से एक है जिसमें निर्देशन की कला का चरम देखा जा सकता है। चाहे वह फिल्म का सेट हो या अदाकारों का चुनाव। चाहे वह मौसिकी की समझ हो या साजिंदों की अहमियत। हर काम में उम्दा तलाशने की जिद के आसिफ को के आसिफ बनाती है।
पैसों की कभी परवाह नहीं की
के आसिफ धुन का पक्का था। धुन का पक्का न होता तो यूनाइटेड प्रोविंस के इटावा में जन्मे इस कलाकार को मुगले आजम बनाने में चौदह साल न लगते। जिस दौर में दस लाख रुपयों में पूरी फिल्में बन जाया करती थीं उस जमाने में यह के आसिफ की सनक ही कही जायेगी कि ‘जब प्यार किया तो डरना क्या’ गाने को फिल्माने में उसने यह रकम खर्च कर डाली थी। यह तो भला हो फिल्म के प्रोडयूसर शापूर जी पल्लोन जी का कि उन्होंने फिल्म के लिए रकम खर्च करने में कोई कसर नहीं छोड़ी वरना पचास और साठ के दशक में डेढ़ करोड़ रुपये एक फिल्म के निर्माण में लगते तो प्रोडयूसर तो हर्ट फेल से मर जाता। पर के आसिफ जानते थे कि वे सिनेमा के पर्दे पर अकबर महान को चित्रित कर रहे हैं और किरदार जब अकबर का हो तो उसकी नफासत, उसका शाहखर्ची का अंदाज, पर्दे पर उसकी बुलंद आवाज सब उसी तर्ज पर नुमायां होनी चाहिए जैसी अकबर से उम्मीद की जाती है और इंशा अल्लाह के आसिफ ने फिल्म के साथ न्याय किया।
नौशाद ने 105 गानों को रिजेक्ट किया था
फिल्म मुगल-ए-आजम सेल्यूलाइड पर लार्जर देन लाइफ नजर आती है तो इसकी एक नहीं कई वजहें हैं। फिल्म के लिए जिन फनकारों का चयन के आसिफ ने किया था वे अपने-अपने क्षेत्र में माहिर लोग थे। फिल्म में कोरस गाने के लिए उस्ताद बड़े गुलाम अली खां साहब को चुना गया था। कहा जाता है कि उन्होंने इसके लिए 25,000 हजार की रकम मांगी थी और यह रकम उस जमाने में बहुत बड़ी थी। नौशाद ने पूरी रात 105 गानों को रिजेक्ट करने के बाद जब प्यार किया तो डरना क्या सांग का चुनाव किया था। फिल्म के एक और गाने ए मोहब्बत जिंदाबाद के लिए रफी के साथ 100 गायकों ने कोरस गाया था।
पृथ्वीराज कपूर के आसिफ के भीतर के कलाकार को पहचानते थे
जैसे खग-खग की भाषा समझता है उसी तरह एक बेहतरीन कलाकार होने के नाते पृथ्वीराज कपूर के आसिफ के भीतर के उम्दा कलाकार को जानते-पहचानते थे। फिल्म के प्रोडयूसर शपूर जी पल्लोनजी मिस्त्री फिल्में देखना पसंद नहीं करते थे पर वे नाटकों के शौकीन थे। नाटक देखने वे अक्सर ओपेरा हाउस जाया करते थे जहां पृथ्वीराज कपूर के नाटकों के शो हुआ करते थे। पृथ्वीराज कपूर के आसिफ के साथ उनकी फिल्म फूल में काम कर चुके थे और उनके हुनर से परिचित थे। उन्होंने एक रोज शपूरजी से कहा कि आपके पास पैसा बहुत है और आपके जैसा आदमी ही के आसिफ जैसे पागल आदमी को फाइनेंस कर सकता है। पता नहीं कितने साल और कितना पैसा लगेगा पर फिल्म वह अभूतपूर्व बनायेगा। पृथ्वीराज कपूर की सिफारिश के बाद शापूरजी फिल्म के प्रोडयूसर बने और फिल्म को पैसा मिलना शुरु हुआ।
अकबर की शख्सियत के दीवाने थे शापूरजी
शपूरजी अकबर की शख्सियत के दीवाने थे और यही दूसरी बड़ी वजह थी जिसके चलते उन्होंने मुगल-ए-आजम फिल्म में पैसा लगाना स्वीकार किया। आसिफ तो सलीम और अनारकली की मोहब्ब्त के दीवाने थे और यही इस फिल्म को बनाने की उनकी वजह थी। के आसिफ ने भी इस फिल्म में अपनी 16 साल की कमाई लगा दी थी। खैर, फिल्म 5 अगस्त 1960 को हिन्दुस्तान में रिलीज हुई। डेढ़ करोड़ में बनी इस फिल्म ने तब साढ़े पांच करोड़ कमाये। फिल्म के प्रति लोगों में इस कदर दीवानगी थी कि लोग रात में जाग-जागकर लाइन में लगते और फिल्म का टिकट खरीदते। के आसिफ की इस फिल्म को आप आज भी देखें तो इसकी कलाकारी का जादू मोहित करता था। फिल्म के गानें सुने जो आपको संगीत के सागर में डूबो ले जायेंगे। के आसिफ तुझे जादू करना आता था। तू सचमुच जादूगर था। ग्रैंड सैल्यूट टू यू।

