दक्षिणपंथियों को झारखंड का छात्र आन्दोलन इतना अच्छा क्यों लग रहा है?

Archana Ekka
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सुशोभित

दक्षिणपंथियों को झारखण्ड का छात्र आन्दोलन इतना अच्छा क्यों लग रहा है? वे आन्दोलनकारी छात्रों को ‘संस्कारी’ और ‘देशभक्त’ क्यों क़रार दे रहे हैं? बिना किसी राजनैतिक स्वार्थ के तो ये लोग कुछ करते नहीं और इससे पहले इन्होंने कभी छात्रों की समस्याओं, शिक्षा-व्यवस्था की दुर्दशा पर चिंता जताई हो, यह भी याद नहीं आता। फिर झारखण्ड पर इनका इतना प्रेम क्यों उमड़ा?

इसका सबसे पहला जवाब तो यही है कि दिल्ली में जंतर-मंतर पर हुए ऐतिहासिक आन्दोलन से यह पूरा गिरोह तिलमिलाया हुआ है और उसको काउंटर करने के अनेक तरीक़े खोज रहा है। इसमें संघ-परिवार के ‘जेन-ज़ी आउटरीच’ कार्यक्रमों, इंस्टाग्राम रीलों, समाज में बढ़ते अपशब्दों (विशेषकर ‘बेटियों’ द्वारा दी जाने वाली गालियों, क्योंकि गालियों पर तो ‘बेटों’ का विशेषाधिकार है) और कथित ‘अपसंस्कृति’ के प्रसार पर व्यापक पैमाने पर जताई जा रही चिंताओं से लेकर झारखण्ड आन्दोलन के ज़रिये ‘काउंटर-नैरेटिव’ बनाने की कोशिशें तक शामिल हैं।

झारखण्ड आन्दोलन की सबसे अच्छी बात इन दक्षिणपंथियों के लिए यह है कि वह किसी भाजपाई सरकार के खिलाफ़ नहीं हो रहा है। यह ‘देशप्रेमी’ कहलाने की पहली शर्त है कि आप भारतीय जनता पार्टी के विरोध में ना हों। लेकिन ग़ौर करने वाली बात यह है कि 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर जो कुछ हुआ और उस पर जैसी व्यापक प्रतिक्रिया हुई, उसके बाद 22 जुलाई को भारतीय जनता पार्टी और भारतीय जनता युवा मोर्चा ने झारखण्ड आन्दोलन में सक्रियतापूर्वक प्रवेश किया। 20 तारीख़ के बाद ही ऐसा क्यों किया गया, वहाँ के छात्रों में तो अप्रैल से ही असंतोष था?

झारखण्ड आन्दोलन भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं को लेकर है। छात्र 14वीं जेपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में अनियमितताओं की शिक़ायत कर रहे हैं। यह परीक्षा अप्रैल में हुई थी। परीक्षा के बाद से ही उसकी प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे थे। जून-जुलाई में राज्य सरकार हरकत में आई और सीआईडी ने जांच शुरू की। परीक्षा-प्रक्रिया से जुड़े लोगों के खिलाफ़ छापेमारी और गिरफ्तारियाँ हुईं। अगस्त की शुरुआत तक 11 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका था। लेकिन 20 जुलाई तक न तो भारतीय जनता पार्टी, ना ही उसके युवा संगठनों, ना ही दक्षिणपंथी टूलकिट और आईटी सेल को इस आन्दोलन से कुछ लेना-देना था। 20 को दिल्ली में हुई घटनाओं के बाद 22 जुलाई को भारतीय जनता पार्टी और भारतीय जनता युवा मोर्चा अचानक झारखण्ड में सक्रिय हुए और जेपीएससी के खिलाफ़ बड़ा प्रदर्शन करते हुए परीक्षा रद्द करने की मांग करने लगे। 22 जुलाई को ही क्यों? उससे पहले क्यों नहीं?

30 जुलाई को आन्दोलन में एजेएसयू भी शामिल हो गई। आपको बता दें कि ऑल झारखण्ड स्टूडेंट्स यूनियन यानी एजेएसयू झारखण्ड में एनडीए की सहयोगी पार्टी है और 2024 के विधानसभा चुनाव में उसे 81 सीटों के सदन में 10 टिकट मिले थे, जो कि भारतीय जनता पार्टी के बाद सबसे ज़्यादा थे। इसके बाद सोशल मीडिया पर दक्षिणपंथियों ने शोर मचाना शुरू कर दिया कि राहुल गांधी झारखण्ड क्यों नहीं जा रहे हैं, क्योंकि कांग्रेस वहाँ सत्तारूढ़ महागठबंधन की सहयोगी है। झारखण्ड में कांग्रेस के 16 विधायक हैं। यहाँ तक कि सीपीआईएमएल के भी वहाँ 2 विधायक हैं। इसी पार्टी की स्टूडेंट विंग आईसा की नेहा राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

‘टूलकिट’ को यह गणित तुरन्त समझ में आया! एक तरफ़ जहाँ भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नेतृत्व जंतर-मंतर के बाद ‘डैमेज-कंट्रोल’ के लिए युवाओं तक आउटरीच-प्रोग्राम चला रहा था, वहीं आईटी सेल झारखण्ड-नैरेटिव चलाने में जुट गई। कहा जाने लगा कि झारखण्ड के आन्दोलनकारी ‘देशभक्त’ हैं, वे भी जेन-ज़ी ही हैं लेकिन ‘अच्छे वाले’ और ‘संस्कारी जेन-ज़ी’ हैं, कि वे ‘वामपंथी’ नहीं हैं, ‘देशद्रोही’ नहीं हैं, ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ वाले नहीं हैं, आदि-इत्यादि। हालाँकि राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे सहित कांग्रेस नेताओं ने छात्रों के आन्दोलन का समर्थन किया है और कल नेहा के नेतृत्व में आईसा वाले भी सत्याग्रही छात्रों के प्रति अपनी सोलेडिरिटी प्रदर्शित करने पहुँचे थे।

छात्रों का अनिश्चितकालीन सत्याग्रह 1-2 अगस्त को शुरू हुआ था और 4-6 अगस्त को कई छात्र भूख हड़ताल पर बैठ गए। झारखण्ड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा से जुड़े देवेंद्र नाथ महतो भी अनशन करने वालों में शामिल थे। 6 अगस्त को भारतीय जनता पार्टी ने विधानसभा के भीतर और बाहर प्रदर्शन करते हुए सीबीआई जाँच की माँग की। ध्यान रहे कि हम झारखण्ड के आन्दोलनकारी छात्रों की नैतिक-वैधता और शुचिता को प्रश्नांकित नहीं कर रहे हैं, हम उनके साथ हैं। लेकिन यहाँ पर हम यह रेखांकित करने का प्रयास कर रहे हैं कि कैसे दक्षिणपंथी टूलकिट चीज़ों को अपने नैरेटिव के हिसाब से ढालता है और आन्दोलनों को अपने हित में हाईजैक करने की कोशिशें करता है।

7 अगस्त को नेहा पर स्याही फेंकी गई और उन्हें सत्याग्रहियों के मंच से भी उतार दिया गया। क्यों? यह छात्रों का आन्दोलन है या वाम-दक्षिण राजनीति का अखाड़ा है? अगर नेहा अपनी आवाज़ को आन्दोलनकारी छात्रों की आवाज़ में मिलाती हैं तो उन्हें इसका समर्थन करना चाहिए या विरोध करना चाहिए? ध्यान रहे, आईसा ने कल जो रैली निकाली, उसमें कोई भी विवादास्पद नारा नहीं लगाया गया था, ना ही कोई आपत्तिजनक बयान दिया गया था। नेहा पर स्याही फेंकने वाला छात्र अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् से सम्बद्ध था, यह तो ख़ैर बिना बताए ही समझ जाने वाली चीज़ थी।

आज 8 अगस्त को हेमंत सोरेन सरकार ने छात्र-प्रतिनिधियों से बातचीत की है, हालाँकि कोई ठोस समाधान नहीं निकला है। किन्तु पड़ोसी राज्य बिहार में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और झारखण्ड अगर उसके ‘डबल-इंजिन’ वाले मनसूबों को खटकता हो तो किसी को अचरज नहीं होना चाहिए। वहाँ सत्तारूढ़ झारखण्ड मुक्ति मोर्चा वाम-रुझान रखने वाला दल है और आदिवासियों के हक़ों की लड़ाई लड़ता रहा है। अगर एक ही तीर से भारतीय जनता पार्टी इस सरकार को कमज़ोर भी कर सकती है और जंतर-मंतर का ‘काउंटर-नैरेटिव’ भी प्रस्तुत कर सकती है तो आईटी सेल भला क्यों कर ना सक्रिय होगी? किन्तु देश्न के गरिकों को अपने सजग-विवेक को जाग्रत रखना होगा।

आशा है कि राहुल गांधी इस मामले में इनवॉल्व होकर सोरेन सरकार से संवाद करेंगे और आन्दोलनकारी छात्रों की माँगें पूरी की जाएँगी, ताकि जहाँ एक तरफ़ उनके साथ न्याय हो, वहीं दूसरी तरफ़ दक्षिणपंथियों की बोलती भी बंद कराई जा सके, क्योंकि तब वह देश की सामूहिक-चेतना के साथ न्याय होगा!
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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अर्चना एक्का को पत्रकारिता का दो वर्ष का अनुभव है। उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत इंटर्नशिप से की। इस दौरान उन्होंने झारखंड उजाला, सनमार्ग और इम्पैक्ट नेक्सस जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया। इन संस्थानों में उन्होंने रिपोर्टर, एंकर और कंटेंट राइटर के रूप में कार्य करते हुए न्यूज़ रिपोर्टिंग, एंकरिंग और कंटेंट लेखन का अनुभव प्राप्त किया। पत्रकारिता के क्षेत्र में वह सक्रिय रूप से काम करते हुए अपने अनुभव को लगातार आगे बढ़ा रही हैं।