


रांची; कांके अंचल के नगड़ी गांव की 2.98 एकड़ जमीन को पुराने अधिग्रहण से मुक्त कराने की मांग झारखंड हाईकोर्ट ने खारिज कर दी है। याचिकाकर्ताओं ने जमीन को अधिग्रहण से बाहर कर मूल रैयतों को वापस करने की मांग की थी।





मामले की सुनवाई करते हुए न्यायाधीश संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने कहा कि संबंधित जमीन का अधिग्रहण काफी पहले कानूनी प्रक्रिया के तहत पूरा हो चुका था। कोर्ट के सामने यह भी आया कि मुआवजे और अवॉर्ड से जुड़ी प्रक्रिया पूरी की जा चुकी है।
1957-58 में शुरू हुआ था जमीन अधिग्रहण
मामला करीब छह दशक पुराने भूमि अधिग्रहण से जुड़ा है। रिकॉर्ड के अनुसार, नगड़ी गांव में बिरसा कृषि कॉलेज के लिए करीब 202.07 एकड़ जमीन के अधिग्रहण की प्रक्रिया वर्ष 1957-58 में शुरू हुई थी।
इसी दौरान भूमि अधिग्रहण वाद संख्या 21/1957-58 दर्ज किया गया था। वर्तमान याचिका में अलग-अलग प्लॉट की कुल 2.98 एकड़ जमीन पर दावा किया गया था।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि जमीन उनके पूर्वजों के नाम दर्ज थी और परिवार का उस पर कब्जा भी रहा है। उन्होंने राजस्व रसीदों का हवाला देते हुए कहा कि जमीन का मूल उद्देश्य के लिए उपयोग नहीं हुआ, इसलिए इसे अधिग्रहण से मुक्त कर वापस किया जाना चाहिए।
सरकार ने कहा- बहुत देर से दायर हुई याचिका
राज्य सरकार ने जमीन वापस करने की मांग का विरोध किया। सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि जमीन का अधिग्रहण कानूनी प्रक्रिया के तहत पूरा हो चुका है और संबंधित भूमि का अवॉर्ड भी पारित किया गया था।
सरकार ने यह भी बताया कि मुआवजे से जुड़ी कार्रवाई पूरी की जा चुकी है। साथ ही याचिका दाखिल करने में हुई लंबी देरी पर भी सवाल उठाया गया।
अधिग्रहित जमीन का दूसरे सार्वजनिक कामों में भी इस्तेमाल
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने जमीन के मौजूदा इस्तेमाल की जानकारी भी रखी गई। अधिग्रहित भूमि के कुछ हिस्से का इस्तेमाल दूसरे सार्वजनिक कार्यों में किया जा चुका है।
जमीन का एक हिस्सा नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ (NUSRL), रांची को दिया गया है। वहीं, कुछ भूमि का इस्तेमाल रांची रिंग रोड के निर्माण में भी हुआ है।
कोर्ट ने उत्तराधिकारी होने के दावे पर भी गौर किया
अदालत ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश दस्तावेजों की भी जांच की। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता खुद को मूल अवार्डियों का वैध कानूनी उत्तराधिकारी साबित करने के लिए पर्याप्त दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके।
अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड और सरकारी दस्तावेजों को देखते हुए माना कि जमीन का अधिग्रहण पुरानी कानूनी प्रक्रिया के तहत पूरा हो चुका था।
कोर्ट ने यह भी माना कि केवल इस आधार पर कि अधिग्रहित जमीन का बाद में किसी दूसरे सार्वजनिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल हुआ, अधिग्रहण को खत्म कर जमीन वापस करने का आदेश नहीं दिया जा सकता।
इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए झारखंड हाईकोर्ट ने कांके के नगड़ी गांव की 2.98 एकड़ जमीन को अधिग्रहण से मुक्त कराने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी।
