नई दिल्ली : दिल्ली का मुखर्जी नगर देशभर में यूपीएससी की तैयारी करने वाले युवाओं के सपनों का ठिकाना है। यहां कोई महंगी कोचिंग के सहारे आगे बढ़ता है तो कोई बेहतर कमरे और सुविधाओं के बीच पढ़ाई करता है। लेकिन इसी शहर में एक ऐसा युवा भी है, जिसके पास रहने के लिए कमरा तक नहीं है। फिर भी उसका सपना किसी से छोटा नहीं है। बिहार के दरभंगा से दिल्ली आए मोहम्मद मिनाज करीब डेढ़ साल से यूपीएससी की तैयारी कर रहे हैं और फिलहाल 24 घंटे खुलने वाली लाइब्रेरी ही उनका घर, पढ़ाई की जगह और रात का ठिकाना है।
कुर्सी पर पैर रखकर सोते हैं, लॉकर में रखा है पूरा सामान
मिनाज के पास दिल्ली में किराए का कमरा नहीं है। करीब 1100 से 1200 रुपये महीने की फीस देकर वह एक लाइब्रेरी में पढ़ते हैं। दिनभर किताबों और नोट्स के बीच समय बिताने के बाद रात में वहीं कुर्सी पर पैर रखकर सो जाते हैं। उनके कपड़े और जरूरी सामान भी लाइब्रेरी के लॉकर में रखे रहते हैं। नहाने के लिए उन्हें करीब 10 किलोमीटर दूर मजनू का टीला जाना पड़ता है। यही जगह उनके लिए खाने का सहारा भी है। वह वहां स्थित गुरुद्वारे में लंगर खाते हैं और फिर वापस लाइब्रेरी लौटकर अपनी पढ़ाई में जुट जाते हैं। मिनाज बताते हैं कि गुरुद्वारे में दोपहर और रात दोनों समय भोजन मिलता है, लेकिन वह आमतौर पर सिर्फ दोपहर में खाना खाते हैं। उनका मानना है कि दो बार आने-जाने में समय और पैसे दोनों खर्च होंगे। मजनू का टीला आने-जाने में करीब 20 रुपये लगते हैं। लाइब्रेरी फीस और दूसरे छोटे खर्च मिलाकर उनका मासिक खर्च करीब 3000 रुपये है।
अपने खर्च के लिए मिनाज एक ऐप के जरिए बैंक अकाउंट खुलवाने से जुड़े काम करते हैं। एक अकाउंट पर उन्हें करीब 300 से 400 रुपये मिलते हैं। महीने में लगभग 10 अकाउंट से उनकी करीब 3000 रुपये की कमाई हो जाती है। उनका कहना है कि नियमित नौकरी करने पर पढ़ाई के लिए समय नहीं बचेगा। 8-10 घंटे की नौकरी के साथ आने-जाने में भी कई घंटे चले जाएंगे। इसलिए उन्होंने कमाई को सीमित रखा है और अपना ज्यादातर समय UPSC की तैयारी को दिया है।
बुजुर्ग माता-पिता से छिपाया अपना संघर्ष
मिनाज के माता-पिता की उम्र 70 साल से ज्यादा है। पिता को डायबिटीज है और परिवार की आर्थिक स्थिति भी मजबूत नहीं है। वह अपने माता-पिता को यह नहीं बताते कि दिल्ली में किस तरह रह रहे हैं। फोन पर बस इतना कहते हैं कि वह ठीक हैं और पढ़ाई अच्छी चल रही है। उन्हें डर है कि अगर माता-पिता को पता चला कि वह लाइब्रेरी में सोते हैं और कई बार सिर्फ एक वक्त खाना खाते हैं, तो उनकी चिंता और बढ़ जाएगी।
मिनाज के परिवार में चार बहनें हैं। तीन की शादी हो चुकी है, जबकि एक बहन अभी पढ़ाई कर रही है। परिवार पर कर्ज भी है। मिनाज जल्द सफल होकर माता-पिता और बहन के लिए बेहतर जिंदगी बनाना चाहते हैं। वह UPSC को सिर्फ सरकारी नौकरी का रास्ता नहीं मानते। गांव में उन्होंने देखा है कि कई लोगों तक सरकारी योजनाओं की सही जानकारी और लाभ नहीं पहुंच पाता। उनका सपना प्रशासन का हिस्सा बनकर ऐसे लोगों के लिए काम करना है।
किताबों से पहले सवालों को समझने पर भरोसा
मिनाज बिना कोचिंग UPSC की तैयारी कर रहे हैं। उनका फोकस पुराने प्रश्नपत्रों पर रहता है। 10वीं में एक शिक्षक से मिली सीख के बाद उन्होंने समझा कि किसी भी परीक्षा में सिर्फ किताबें पढ़ना काफी नहीं, बल्कि यह समझना जरूरी है कि सवाल किस तरह पूछे जाते हैं। इसी रणनीति के तहत वह पहले प्रश्नों का पैटर्न समझते हैं और फिर उसी हिसाब से पढ़ाई की योजना बनाते हैं। महंगी कोचिंग उनकी पहुंच से बाहर है, इसलिए वह सेल्फ-स्टडी और दूसरे अभ्यर्थियों से मिलने वाली सलाह पर निर्भर हैं।
स्वामी विवेकानंद से प्रेरणा, मंजिल माता-पिता की खुशी
मिनाज स्वामी विवेकानंद को अपना आदर्श मानते हैं। उनका कहना है कि सफलता उनके हाथ में नहीं है, लेकिन पूरी मेहनत करना उनके हाथ में जरूर है। यही सोच उन्हें हर दिन लाइब्रेरी की उसी कुर्सी पर वापस ले आती है। कमरा नहीं, सुविधाएं नहीं, आर्थिक मदद नहीं… फिर भी सपना बड़ा है। वह चाहते हैं कि उनके बुजुर्ग माता-पिता अपनी आंखों से उनकी सफलता देखें। शायद यही वजह है कि मिनाज की कहानी सिर्फ UPSC की तैयारी की कहानी नहीं, बल्कि सुविधाओं से ज्यादा मजबूत हौसले और सपने की कहानी बन जाती है।

