सुशोभित
श्रीप्रेमानंदजी महाराज का नाम इधर कुछ विवादों से जुड़ा है। सत्यता क्या है और उनमें उनका दोष कितना है, यह तो वे ही जानें। प्रसिद्धि का स्वरूप कुछ ऐसा है कि उसके साथ कोई-ना-कोई कलंक-कथा जुड़ ही जाती है। प्रसिद्धि वर्तमान युग का विष है। इसके लिए सभी विकलते भी हैं और इससे हताहत भी होते हैं। शायद यही कारण रहा हो कि अतीत के साधु-संत एकान्तवास-अज्ञातवास करते थे, और आज भी वैसे अज्ञातवासी कम नहीं हैं। जो संसार के सम्मुख प्रकाशित हुआ, उसके दोषों का दर्शन होता ही है। न्याय के मानदण्ड पर जो भी सत्य हो, वह सामने आए और अपराधी को दण्ड मिले, इससे अधिक कुछ कहा नहीं जा सकता।

किन्तु एक बात कहने की अवश्य आवश्यकता है। वर्तमान काल के समस्त लोकप्रिय संतों-कथावाचकों-पीठाधीश्वरों में प्रेमानंदजी का आध्यात्मिक दाय सबसे अधिक है। बहुधा उनकी वाणी में प्रामाणिकता पाई है। उनमें अनुभवप्रसूत खरापन है। वे रसज्ञ और शास्त्रज्ञ दोनों हैं। प्राय: उन्हें उग्रता, कटुता, राजनीति आदि से दूर रहकर सदुपदेश देते ही पाया है और जीवहत्या-मांसाहार का जो मुखर-विरोध उन्होंने किया, उसके लिए मेरे मन में उनके प्रति विशेष आदर-भाव है। यों वे ज्ञानमार्गी नहीं भक्तिमार्गी हैं और नामजप का उपदेश देते हैं। वर्तमान युग के मनुष्य का कलुष नामजप से कट सकेगा, इसमें मुझको संशय है। उसके लिए तो कठोर ज्ञानमार्ग की सघन आत्म-मीमांसा ही चाहिए। किन्तु यह मेरा निजी मत है और साधना के अन्य उपायों के निषेध का मुझे अधिकार नहीं। वर्तमान भारत को सदुपदेशों की बहुत आवश्यकता है, इसमें संशय नहीं।
एक बात किसी ने सार्वजनिक रूप से शायद नहीं कही हो, पर मैं कहता हूँ कि प्रेमानंदजी पर स्वामी रामसुखदास का गहरा प्रभाव परिलक्षित होता है। ‘प्रश्नोत्तरमणिमाला’ में स्वामी रामसुखदास प्रश्नों के जैसे उत्तर देते थे, लगभग वैसे ही उत्तर प्रेमानंदजी अपने एकान्तिक प्रवचनों में देते पाए गए हैं। ‘साधक-संजीवनी’ के महत्त्व को तो उन्होंने प्रत्यक्ष में स्वीकारा है। भागवत, ब्रह्मवैवर्त, पद्म, हरिवंशादि पुराणों में प्रेमानंदजी की सिद्धि स्पष्ट दीखती है। ‘सूरसागर’ में भी उनका अवगाहन है, किन्तु ‘गीत गोविन्द’ की रमणतृषा वाली भावभूमि से विच्छिन्न हैं या उसे श्रीकृष्णतत्त्व की निगूढ़, दुर्बोध लीला का एक आयाम स्वीकारते हों तो हों, उसका उपदेश तो नहीं देते। पं. विद्यानिवास मिश्र ने ‘गीत गोविन्द’ को भागवत की प्रौढ़ावस्था कहा था, उससे प्रेमानंदजी शायद ही सहमत हों। वे वृन्दावनवासी हैं और हित हरिवंश महाप्रभु की परम्परा में राधावल्लभ सम्प्रदाय से आते हैं। राधारानी की सर्वोच्च सत्ता को स्वीकारते हैं और उन्हें किशोरी-जू, लाड़ली-जू कहकर माधुर्य से पुकारते हैं। पीताम्बर तो हैं ही, भाल पर राधाचन्दन और ब्रजरज का लेप करने के कारण पीताभ भासते भी हैं!
जब कुछ चर्चित और सफल हस्तियों ने उनके वृन्दावन स्थित श्रीहितराधा केलिकुंज धाम की यात्रा की, तो वे प्रकाश में आए। किन्तु यह जनसामान्य का दृष्टिदोष ही कहलाएगा। किसी संत का महत्त्व इससे तय नहीं हो सकता कि कितनी बड़ी हस्तियाँ उसकी शरणागत हैं या कितनी संख्या में उनके भक्त-अनुयायी हैं। उसका निकष तो उनके उपदेशों की प्रामाणिकता ही है। वे वृक्कों के असाध्य रोग से ग्रस्त बतलाए जाते हैं, पर जीवन्मुक्त और देहमुक्त की दशा में मालूम होते हैं। आरम्भ में ये शिवोपासक और काशीवासी थे, फिर जाने किस प्रेरणा से वृन्दावन आए और श्रीचैतन्यमहाप्रभु के वचनों और श्रीश्यामाश्याम की रासलीला में डूबे। सम्प्रदाय परिवर्तन हुआ। नया पथ सूझा। ‘श्रीराधारस सुधानिधि’ का एक श्लोक सुनने के बाद वे श्रीहरिवंश महाप्रभु की लीला में मग्न हो गए हैं।
चूंकि वे नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं, इसलिए इन्द्रिय संयम का उपदेश देते हैं। युवाओं से ब्रह्मचर्य व्रत के पालन का आग्रह करते हैं। इससे आपकी जो सहमति-असहमति हो किन्तु देह के सुखों के प्रति एक तरह की निंदा-दृष्टि, त्याज्य का भाव रखना अध्यात्म-पथ का प्राथमिक गुण है, क्योंकि पूरी तैयारी ही देहत्याग और भगवत्प्राप्ति के लिए है। आज समाज में जैसी सघन यौन-वृत्ति है और उससे उत्पन्न जैसी सामूहिक विक्षिप्तता है, उसका निवारण इन्द्रिय-निग्रह के उपदेश मात्र से तो होने से रहा, फिर भी उस बात को बल से कहने का भी एक प्रताप है! प्रचण्ड भोगवाद की आँधी थमे और मनुष्य शरीर के तल से ऊपर उठकर विचार करने को प्रवृत्त हो, इस दिशा में प्रेमानंदजी का कार्य रहा है और इसके लिए वे साधुवाद के सुपात्र हैं। जहाँ तक दोषों का प्रश्न है तो देह का चोला धरने के बाद उससे मुक्ति तो किसी की नहीं, बड़े-बड़े संतों के साथ कोई-न-कोई कलुष-कथा जुड़ ही जाती है। प्रारब्ध के देवता अगर कहीं हो तो उसकी चिंता कर लेंगे। वर्तमान में तो मुझे जो कहना उचित लगा, सो मैंने कहा। आगे पाठकों की स्वयं की विवेक-बुद्धि प्रकाशित है ही। इति!
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।


