रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) की 11वीं से 13वीं सिविल सेवा परीक्षा, बाल विकास परियोजना पदाधिकारी (सीडीपीओ) और फूड सेफ्टी अफसर की नियुक्ति परीक्षाओं को रद्द करने के राज्य सरकार के आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई पूरी कर ली है। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने मामले में सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है और सभी प्रार्थी पक्षों तथा राज्य सरकार को संक्षिप्त लिखित पक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत में अब तक की गई जांच की सीलबंद रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे में स्पष्ट कहा गया कि यह मामला किसी एक व्यक्ति द्वारा किए गए कदाचार का नहीं, बल्कि पूरी परीक्षा प्रणाली के धोखाधड़ी से दूषित होने का है। सरकार ने दलील दी कि जब परीक्षा का आयोजन करने वाली एजेंसी ही भ्रष्ट हो, तो अलग-अलग उम्मीदवारों को अलग से नोटिस देने की आवश्यकता नहीं रह जाती।
सीआईडी जांच में खुलासा हुआ है कि परीक्षा की ओएमआर (OMR) शीट में व्यापक पैमाने पर छेड़छाड़ की गई। इसके साथ ही ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम में भी गंभीर गड़बड़ियां पाई गईं। जांच में यह आरोप भी सामने आया है कि तत्कालीन परीक्षा नियंत्रक ने व्हाट्सएप के माध्यम से आंसर-की भेजी थी। परीक्षा में कई सॉल्वर गैंग का इस्तेमाल किया गया और अभ्यर्थियों का फेरबदल भी किया गया।
राज्य सरकार का कहना है कि यह मामला केवल किसी व्यक्तिगत कर्मचारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का नहीं, बल्कि पूरी भर्ती प्रक्रिया को रद्द करने से जुड़ा है। जब परीक्षा कराने वाली एजेंसी खुद भ्रष्ट हो और आयोग के अध्यक्ष सबूत नष्ट कर रहे हों, तो पूरी चयन प्रक्रिया ही संदिग्ध हो जाती है। ऐसी दूषित परीक्षा प्रक्रिया से चयनित उम्मीदवारों को सिविल सेवा में न रखकर, नई परीक्षा का आयोजन एक निष्पक्ष एवं स्वच्छ एजेंसी के माध्यम से कराना ही संवैधानिक रूप से उचित मार्ग है।
सुनवाई के दौरान हस्तक्षेपकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता कुमार हर्ष ने अदालत को बताया कि 11वीं-13वीं सिविल सेवा परीक्षा और सीडीपीओ परीक्षा आयोजित कराने वाली एजेंसी ‘टीडीपीएल’ ने कथित तौर पर 50-50 लाख रुपये लेकर कई अभ्यर्थियों को परीक्षा में सफल कराया। जांच में अभय कुमार तिवारी ने भी इस संबंध में अपना बयान दर्ज कराया है। गौरतलब है कि पिछली सुनवाई में जेपीएससी की ओर से भी यह स्वीकार किया गया था कि परीक्षाओं में व्यवस्थित तरीके से अनियमितताएं हुई हैं।


