
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीक जहां कई क्षेत्रों में मददगार साबित हो रही है, वहीं अब यह वैज्ञानिक शोध की विश्वसनीयता के लिए चिंता का कारण बनती जा रही है। हाल ही में सामने आए एक अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2025 में करीब 1.5 लाख फर्जी और मनगढ़ंत साइटेशन्स वैज्ञानिक रिकॉर्ड का हिस्सा बन गए। इनमें अधिकांश संदर्भ एआई टूल्स द्वारा तैयार किए गए बताए जा रहे हैं।
बड़े पैमाने पर हुई रिसर्च
यह चौंकाने वाला खुलासा कॉर्नेल यूनिवर्सिटी, यूसीएलए और यूसी बर्कले के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन में हुआ है। ‘एलएलएम हैलुसिनेशन्स इन द वाइल्ड’ शीर्षक वाली इस स्टडी में 2020 से 2025 के बीच प्रकाशित करीब 25 लाख रिसर्च पेपर्स के 11.1 करोड़ साइटेशन्स का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि बड़ी संख्या में ऐसे संदर्भ मौजूद थे, जिनका कोई वास्तविक स्रोत उपलब्ध नहीं था।
ऐसे पकड़े गए फर्जी साइटेशन्स
शोधकर्ताओं ने उन साइटेशन्स को ट्रैक किया जिनके शीर्षक सिमेंटिक स्कॉलर, ओपनएलेक्स और गूगल स्कॉलर जैसे प्रमुख अकादमिक डेटाबेस में नहीं मिले। इसके बाद 2022 के बाद के डेटा की तुलना पुराने एरर बेसलाइन से की गई। जांच में सामने आया कि एआई टूल्स द्वारा उत्पन्न गलत और मनगढ़ंत जानकारी इस बढ़ोतरी का मुख्य कारण है।
2024 के बाद तेजी से बढ़ा खतरा
अध्ययन के मुताबिक फर्जी साइटेशन्स में सबसे अधिक बढ़ोतरी 2024 के मध्य से देखी गई। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो वैज्ञानिक शोध की विश्वसनीयता और गुणवत्ता पर गंभीर असर पड़ सकता है।

