बाबा बंदी उरांव: चंदवा-रुपसपुर नरसंहार के बाद आदिवासियों पर अत्याचार सहन नहीं हुआ तो नौकरी छोड़ राजनीति में आ गए लोकनायक बाबा बंदी उरांव

रुपसपुर नरसंहार की भयावह घटना ने बाबा बंदी उरांव को झकझोर दिया। पुलिस सेवा छोड़ उन्होंने आदिवासी अधिकारों की लड़ाई चुनी और सिसई से पांच बार विधायक बनकर इतिहास रचा।

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  • सीमांचल के लोग कार्तिक उरांव और बंदी बाबा को अपना इष्ट पुरुष मानते हैं

  • बंदी उरांव बाबा कार्तिक उरांव की प्रेरणा से राजनीति में आए थे

  • 1980 में सिसई से विधायक चुने जाने पर वे लगातार पांच बार इस क्षेत्र से विधायक चुने गए

  • सिसई से विधानसभा का पहला चुनाव लड़ने के लिए उन्हें 30000 रुपये खर्च करने पड़े थे जिसमें 5000 रुपये उन्हें पार्टी फंड से मिले थे

दयानंद राय

22 नवंबर 1971 को बिहार के पूर्णिया जिले में कम से कम 14 आदिवासियों की नृशंस हत्या ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। संयोग से इस हत्याकांड की जांच का जिम्मा लोकनायक बंदी उरांव को मिला। बंदी उरांव उन दिनों बीपीएससी के जरिये पुलिस सेवा के लिए चुने गए थे। यह नरसंहार बिहार विधानसभा के तत्कालीन विधानसभाध्यक्ष डॉ लक्ष्मीनारायण सुधांशु ने करवाया। बंदी को उरांव को जैसे ही इस नरसंहार की सूचना मिली वे सदल-बल घटनास्थल पर पहुंचे और जले-अधजले लाशों को कोसी नदी में फेंकने जा रहे ट्रक को पकड़कर लाशों को बरामद किया। इस हत्याकांड ने बाबा बंदी उरांव को झकझोर कर रख दिया और उन्होंने नौकरी छोड़ राजनीति में आने का फैसला किया।

दोषियों को सलाखों के पीछे भेजकर ही दम लिया

पूर्णिया के रुपसपुर गांव में आदिवासियों के नरसंहार की वजह बिहार विधानसभा के तत्कालीन स्पीकर डॉ लक्ष्मीनारायण सुधांशु थे। वे चंदवा के जमींदार भी थे और उनकी मंशा संथाल आदिवासियों की जमीन पर कब्जा करने की थी। उनकी ही शह पर गंड़ासा, तलवार और कुल्हाड़ी लिए आए दहशतगर्दों ने संथाल आदिवासियों को काट डाला और उनके घरों में आग लगा दी। इस नरसंहार में कम से कम 14 आदिवासी मारे गए थे।

इस केस की छानबीन करते हुए बंदी उरांव जान गए थे कि इस हत्याकांड के पीछे किसका हाथ है, इसके बाद भी उन्होंने केस का सुपरविजन किया और दोषियों को सलाखों के पीछे भेज कर माने। ऐसा करते हुए उन्हें अपनी सीमितताओं और नौकरी की चुनौतियों का भी भान हुआ। लेकिन अपने भाईयों की हत्या से उनका मन द्रवित हो चुका था, कोशी कमिश्नरी के आदिवासियों की अशिक्षा और गरीबी देखकर उन्होंने तय किया कि वे अपना पूरा जीवन आदिवासी उत्थान में लगा देंगे और वही उन्होंने किया भी। उन्हें लगा कि आदिवासियों का उत्थान करना है तो सबसे पहले उन्हें संगठित करना होगा।

इसके लिए उन्होंने आदिवासियों को संगठित करने के लिए जागरूकता अभियान चलाया और आदिवासी विकास परिषद की प्रमंडलीय शाखा की स्थापना की। इस तरह उन्होंने बाबा साहेब भीमराव अंबेदकर की तरह शिक्षित बनो, संगठित होओ और संघर्ष करो के मूलमंत्र का प्रचार-प्रसार कराया।

पूर्णिया में करायी थी पंखराज बाबा कार्तिक उरांव की जनसभा

उन दिनों आदिवासी नेता के रूप में पंखराज बाबा कार्तिक उरांव की लोकप्रियता चरम पर थी। बंदी उरांव ने अपने नेतृत्व में पूर्णिया के रंगभूमि मैदान में आदिवासियों की विशाल जनसभा करायी। जनसभा में लाखों की भीड़ उमड़ पड़ी। बाबा कार्तिक उरांव से उन आदिवासियों की दुर्दशा देखी नहीं गयी और उनकी आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे।

जो गति तोरी सो गति मोरी की तरह बाबा बंदी उरांव भी आदिवासियों की गरीबी और अशिक्षा को मिटाना चाहते थे, इस क्रम में वे राजनीति में आए और 1980 में पहली बार सिसई से विधायक चुने गए और लगातार पांच बार विधायक निर्वाचित होते रहे। वर्ष 1980 में बिहार सरकार के योजना और विकास विभाग के मंत्री के रूप में तो उन्होंने कमाल का काम किया और अपनी दक्षता और प्रभावशीलता से सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। भारत के अनुसूचित जाति आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में भी उनका कार्यकाल उल्लेखनीय रहा।

हमेशा आदिवासी समाज के उत्थान के लिए प्रयत्नशील रहे

बंदी उरांव को जाननेवालों का कहना है कि वे हमेशा आदिवासियों के उत्थान के लिए काम करना चाहते थे, उन्हें हमेशा लगता था कि राजनीति में आकर वे जनसेवा का काम कर पायेंगे। इसी ख्याल से वे राजनीति में आए और उन्हें जनता ने सिर आंखों पर बिठाया। उनका राजनीतिक जीवन व्यस्तता से भरा रहा। एक नेता के रूप में उनका व्यक्तित्व बेहद गंभीर था। उनके व्यक्तित्व में सरलता थी और क्षेत्र और समाज के लोग उन्हें अपने गार्जियन के रूप में देखते थे। बाबा बंदी उरांव भी जन-जन की आकांक्षाओं पर खरा उतरने का पूरा प्रयास करते थे।

सीधी बात नो बकवास पर था उनका विश्वास

बाबा बंदी उरांव जमीनी नेता थे, राजनीति और व्यक्तिगत जीवन में सफलता उन्हें गहरे संघर्ष के बाद मिली थी इसलिए वे सीधा और बेलाग बोलने में यकीन करते थे। बिना किसी से भेदभाव के किसी बात को सीधे तौर पर कहना उनकी आदत थी। लोकसंगीत उन्हें बेहद पसंद था। कुड़ुख भाषा का गीत संगीत उन्हें प्रिय था। गीतों में रुचि के कारण वे उन्हें कभी-कभी गुनगुनाते भी थे। उनके पास गीतों का भंडार था।

क्या था पूर्णिया का रुपसपुर हत्याकांड

पूर्णिया का चंदवा रुपसपुर हत्याकांड आजाद भारत के पहले आदिवासी नरसंहार के रूप में याद किया जाता है और इसके पीछे हाथ था बिहार विधानसभा के तत्कालीन स्पीकर डॉ लक्ष्मीनारायण सुधांशु का। उस समय की मीडिया रिपोर्ट के अनुसार डॉ लक्ष्मीनारायण सुधांशु की नजर संथाल आदिवासियों की उपजाऊ जमीन पर थी जिसे आदिवासी पुरखा-दर-पुरखा जोतते-कोड़ते आ रहे थे। डॉ सुधांशु किसी भी कीमत पर इस जमीन पर कब्जा चाहते थे। इसलिए उन्होंने अपनी शह पर इस नरसंहार को अंजाम दिलवाया।

घटना में 14 आदिवासियों को जिंदा जला दिया गया था और करीब 36 लोग घायल हुए थे। उस समय के आदिवासी नेता पृथ्वी चंद किस्कू के मुताबिक नरसंहार में मारे गए आदिवासियों की संख्या 14 से अधिक थी। इस नरसंहार में इतनी दरिंदगी की गयी थी कि 88 साल के बुर्जुग से लेकर तीन साल तक की बच्चियों को बेरहमी से मारा गया था।

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