दिल वो नगर नहीं कि फिर आबाद हो सके… सीता निवास के जमींदोज होते ही धूल में मिल गयी ऐतिहासिक विरासत

Archana Ekka
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शुभनीत कौशिक

बीएचयू परिसर स्थित ‘सीता निवास’ कल ध्वस्त कर दिया गया। ‘सीता निवास’ – जो भारत कला भवन के संस्थापक राय कृष्णदास का निवास स्थान रहा था। इस तरह बीएचयू के इतिहास ही नहीं बल्कि बनारस के अतीत, कला-संस्कृति और साहित्य का एक गौरवशाली अध्याय मिटा दिया गया। विकास और निर्माण की घनघोर आंधी में अतीत के पन्नों को सहेजने की भला किसे पड़ी है! विश्वविद्यालय प्रशासन को शायद इसकी ज़रूरत भी न महसूस होती हो।

अभी पिछले दिनों ही मालवीय जी के वंशज लक्ष्मीधर मालवीय का अद्भुत संस्मरण ‘लाई हयात आए’ पढ़ा था। उसमें राय कृष्णदास की स्मृति में लक्ष्मीधर जी का लिखा एक लेख है, शीर्षक है ‘राय साहब’। उसमें वर्ष 1936 में स्थापित ‘सीता निवास’ की बार-बार चर्चा आई है। वे लिखते हैं ‘कदाचित् सन् 1950 के आसपास पं. गोविन्द मालवीय के अनुरोध करने पर राय साहब ने भारत कला भवन, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को दान कर दिया और विश्वविद्यालय के आग्रह पर सपरिवार विश्वविद्यालय के परिसर में रहने लगे, सीता निवास में।’

उल्लेखनीय है कि कुछ समय तक मालवीय जी का परिवार भी सीता निवास में रहा था, जिसका ज़िक्र लक्ष्मीधर जी ने अपने संस्मरणों में किया है। वह लेख पढ़ते हुए तय किया था कि इस बार बीएचयू जाऊंगा तो सीता निवास जाकर एक बार प्रणाम ज़रूर करूंगा, उसकी मिट्टी को स्पर्श करूंगा। पर दुर्भाग्य देखिए अब सीता निवास ही मिट्टी में मिल गया।
सीता निवास यानी वह भवन जहाँ कला-इतिहास के मर्मज्ञ, जयशंकर प्रसाद के अनन्य मित्र और ‘भारती भंडार’ जैसी प्रकाशन संस्था के संचालक राय कृष्णदास और आनंदकृष्ण लंबे समय तक रहे। जहां रामधारी सिंह ‘दिनकर’, बालकृष्ण शर्मा नवीन, हरिवंश राय बच्चन, मैथिलीशरण गुप्त जैसे साहित्यकारों, आचार्य नरेंद्र देव जैसे विचारकों का आना-जाना रहा हो।
जिसके बारे में दिनकर’ ने कहा था कि , ‘स्नेह, सत्कार और स्वागत की सघनता तो ‘सीता निवास’ में है ही, मगर कोई चीज थी जो ‘शान्ति कुटीर’ के साथ ही विदा हो गयी। असल में वह कुटीर साहित्य का सिद्धपीठ था।’

सीता निवास का निर्माण आगरा मेडिकल कॉलेज से डाक्टरी की पढ़ाई करने वाली चिकित्सिका डॉ. सिताबो बाई द्वारा बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी को दी गई दानराशि से हुआ था। मालवीय जी ने ही इसका नामकरण किया था ‘सीता निवास’। लेकिन अब वह ‘सीता निवास’ मिट्टी में मिल गया। उसका वजूद विश्वविद्यालय के मानचित्र से, उसकी ज़मीन से हमेशा के लिए मिटा दिया गया। कहाँ तो बीएचयू द्वारा सीता निवास को एक स्मारक के रूप में संरक्षित किया जाना चाहिए था और कहाँ यह दिन!
आज बीएचयू प्रशासन ने यह सब दरकिनार करते हुए डॉक्टर सिताबो बाई, राय कृष्णदास जैसे लोगों की यादगार को कृतघ्नतापूर्वक ज़मींदोज़ कर दिया है। अपने अतीत के प्रति हम भारतीयों की यह उपेक्षा जगजाहिर है, यह उसकी मिसाल है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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अर्चना एक्का को पत्रकारिता का दो वर्ष का अनुभव है। उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत इंटर्नशिप से की। इस दौरान उन्होंने झारखंड उजाला, सनमार्ग और इम्पैक्ट नेक्सस जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया। इन संस्थानों में उन्होंने रिपोर्टर, एंकर और कंटेंट राइटर के रूप में कार्य करते हुए न्यूज़ रिपोर्टिंग, एंकरिंग और कंटेंट लेखन का अनुभव प्राप्त किया। पत्रकारिता के क्षेत्र में वह सक्रिय रूप से काम करते हुए अपने अनुभव को लगातार आगे बढ़ा रही हैं।