

शीशपाल गोसाईं





हरिद्वार के खड़खड़ी घाट पर चंद्र सिंह जी को अड़ेत कर शाम को देहरादून लौटे, तो आँखों के आगे उनके किस्सों का एक कभी न खत्म होने वाला कारवां चल रहा है। आज विदाई के इस शून्य में, उस खरे सोने जैसे इंसान की कुछ यादें सहेज रहा हूँ। मैं उन दिनों टिहरी (गढ़वाल )जिले में ‘नवभारत टाइम्स’ का प्रतिनिधि था, इस नाते उनसे मिलने का मौका मिलता रहता था। बात सन् 1998 की है, जब उत्तर प्रदेश के दौर में वे टिहरी बाँध परियोजना के पुनर्वास निदेशक बनकर नई टिहरी आए थे। वह वरिष्ठ आईएएस का पद था, जिसका रुतबा जिलाधिकारी से भी ऊपर माना जाता था। लेकिन पद जितना विराट था, उनका जीवन उतना ही अकिंचन। वे नई टिहरी के गेस्ट हाउस के एक साधारण से कमरे में सिमटे रहते थे। एक दिन उनकी धर्मपत्नी देहरादून से उनसे मिलने नई टिहरी आईं। दो-तीन दिन बाद जब उनकी वापसी का वक्त आया, तो उन्होंने सहज भाव से सरकारी गाड़ी से देहरादून छोड़ने का आग्रह किया। चंद्र सिंह जी ने शांत पर दृढ़ स्वर में कहा- “सरकारी गाड़ी आपको बस अड्डे (डेढ़ किलोमीटर) तक छोड़ देगी। वहाँ से ट्रैकर मिल जाएगा, उसी से देहरादून चली जाइए।” पत्नी का नाराज़ होना स्वाभाविक था, पर सिद्धांतों के इस धनी ने साफ कह दिया- “सरकार ने मुझे यह गाड़ी सरकारी काम के लिए दी है, पत्नी को घुमाने के लिए नहीं।”
आखिरकार, एक आईएएस की पत्नी कमांडर जीप (पब्लिक सवारी) में बैठकर बुकराबुकरी रो कर देहरादून लौटीं। इस घटना की पुष्टि स्वयं चंद्र सिंह जी ने मुझसे की थी। दुनिया को यह व्यवहार कठोर लग सकता है, लेकिन उनके लिए लोकधन जनता की अमानत था, जिसे छूना भी वे पाप समझते थे। उनकी मुस्तैदी का एक और भावुक प्रसंग देखिए। निदेशक आवास पर आने वाले पुराने अखबारों की रद्दी बिकने पर जो 70–75 रुपये मिले, वे चाहते तो उनका स्टाफ चाय-पानी में उड़ा देता। ऐसा अक्सर 99% जगह होता है. पर उन्होंने वह पूरी रकम सरकारी कोषागार नई टिहरी में जमा करवा दी। ₹75 की कीमत आज भले कुछ न हो, लेकिन उसूलों के तराजू में इसका वजन करोड़ों से भारी था।
नई टिहरी में उन्होंने ‘ठक्कर बापा छात्रावास’ का निर्माण जिस आत्मीयता से कराया, वह उनके भीतर छिपे एक संवेदनशील इंसान की कहानी है। बचपन के अभावों में वे स्वयं पुरानी टिहरी के इसी छात्रावास में रहकर पढ़े थे। जब नियति ने उन्हें निदेशक बनाया, तो उन्होंने डूब चुके उस अतीत का कर्ज चुकाया। करोड़ों की लागत से एक भव्य छात्रावास नई टिहरी में खड़ा कर दिया, ताकि किसी गरीब बच्चे के सपने पैसों की कमी से न टूटें। यह केवल एक भवन नहीं, उनके संघर्षमय बचपन का ऋण था। चंद्र सिंह जी ने अपने जीवन से सिद्ध किया कि लोकसेवा पद से नहीं, चरित्र से महान बनती है। वे सत्ता के नहीं, सिद्धांतों के संन्यासी थे। कुछ लोग इतिहास में पद के कारण दर्ज होते हैं, लेकिन चंद्र सिंह जी जैसे फकीर अपने चरित्र के कारण अमर हो जाते हैं।
अलविदा साहब! आपकी कमी हमेशा खलेगी। श्रद्धांजलि! ॐ शांति।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
