

- रजनीकांत
नालंदा : बिहार शरीफ के टिकुलीपर में एक ही तो क्लब था। अंग्रेज़ आए थे। उन्होंने सोचा कि शासन के साथ थोड़ा क्लब कल्चर भी छोड़ चलते हैं। इसलिए सन 1901 में बना विक्टोरिया क्लब। रानी विक्टोरिया के नाम पर। लॉन टेनिस कोर्ट बना। अंग्रेज़ टेनिस खेलते थे। खेलते-खेलते चले भी गए।





देश आज़ाद हुआ। क्लब भी आज़ाद हो गया। नाम बदलकर बिहार क्लब रख दिया गया। बैडमिंटन आया। स्विमिंग पूल बना। शहर के लोग जुड़े। सदस्य बने। यह सिर्फ़ एक इमारत नहीं थी, शहर की सामाजिक और खेल संस्कृति का हिस्सा थी। फिर आया स्मार्ट सिटी का दौर। लाखों रुपये खर्च हुए। रंग-रोगन हुआ। मरम्मत हुई। तस्वीरें खिंचीं।
उद्घाटन की बातें हुईं। कागज़ों में क्लब स्मार्ट हो गया। लेकिन ज़रा क्लब जाइए। गेट पर एक ताला आपका इंतज़ार कर रहा है। एक साल से ज़्यादा हो गया।
ताला वैसा ही है। अंदर कोई रैकेट नहीं चल रहा। कोई शटल नहीं उड़ रही। स्विमिंग पूल में तैराक नहीं, सन्नाटा है। और लॉन टेनिस कोर्ट… वहाँ टेनिस की गेंद नहीं, ईंटें रखी हैं। कितनी अजीब बात है! जिस शहर में खिलाड़ी तैयार होने चाहिए थे, वहाँ ताले तैयार हो गए। जिस कोर्ट पर सर्विस होनी थी, वहाँ निर्माण सामग्री सर्विस दे रही है।
अब जिला प्रशासन मेंटेनेंस का हिसाब लगा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि जो क्लब खुला ही नहीं, उसका मेंटेनेंस किसके लिए? जनता के लिए बना था या सिर्फ़ फ़ाइलों के लिए?
शहर का विकास सीमेंट, पेंट और टाइल्स से नहीं होता। विकास तब होता है जब बच्चे मैदान में पहुंचें, युवा खेलें, बुज़ुर्ग बैठकर शाम बिताएँ और एक सार्वजनिक जगह सचमुच सार्वजनिक हो। बिहारशरीफ का यह क्लब आज सिर्फ़ बंद नहीं है, यह हमारी प्राथमिकताओं का आईना है।
हम कहते हैं कि खेलो, आगे बढ़ो, मेडल लाओ।लेकिन पहले मैदान तो खोलिए।ताला खोलिए।क्योंकि बंद क्लबों से खिलाड़ी नहीं निकलते। और अगर एक ही क्लब भी सालों तक बंद रहे, तो फिर शहर खेल नहीं, सिर्फ़ इंतज़ार सीखेगा…
