

दयानंद राय





अंतरराष्ट्रीय ख्याति के अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज को रांची सड़कों पर साइकिल पर पैडल मारकर चलते देखना आश्चर्यजनक है। एक रोज उनसे मुलाकात हुई, मैंने कहा कि मैंने आपका लिखा आलेख अखबार में देखा है और आपके विचारों का समर्थक हूं तो वे थोड़ी देर रुके, फिर मुस्कुराकर निकल गए। मैं भी वहां से आगे बढ़ गया लेकिन एक मलाल रह गया कि एक तस्वीर ले लेता तो अच्छा होता। बाद में उन्हें फिर ढूंढने की कोशिश की पर वे नहीं मिले।
मामला ये है कि जब भी मैं ज्यां द्रेज को साइकिल पर देखता हूं और फिर इस तथ्य पर गौर फरमाता हूं कि ये साधारण सा दिखने वाला आदमी लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स सरीखे संस्थानों में पढ़ा चुका है और अमर्त्य सेन जैसे अर्थशास्त्रियों के संग इसकी सोहबत रही है तो कौतूहल होने लगता है। आजकल तो हमारे यहां चपरासी भी साइकिल से चलना अपनी तौहीन समझते हैं, मुखिया और वार्ड पार्षद सरीखे जनप्रतिनिधि स्कोर्पियो से चलते हैं और अंतरराष्ट्रीय ख्याति का यह आदमी साइकिल से चलता है। सिर्फ चलता नहीं उसे इंज्वाय करता है तो समझ में आने लगता है कि हमारा समाज पतनशील क्यों है। ऐसा भी नहीं है कि ज्यां द्रेज साइकिल पर रांची में आने के बाद चल रहे हैं। वे बीते चालीस वर्षों से अधिक समय से भारत में रह रहे हैं और अपने लेखों और अर्थशास्त्र में अपने योगदान के लिए चर्चा में रहे हैं। ज्यां द्रेज रांची यूनिवर्सिटी में विजिटिंग प्रोफेसर हैं। नरेगा की ड्राफ्टिंग करने के अलावा ज्यां राइट टू फूड कैंपेन, सूचना का अधिकार जैसे कई मुहिम में सक्रिय भूमिका निभा चुके हैं।
श्रम को सम्मान देना जानते हैं
ज्यां द्रेज को देखकर यह साफ समझ में आता है कि वे श्रम को सम्मान देना जानते हैं और वंचित तबके के लिए काम करने का जज्बा भी उनमें कूट-कूटकर भरा है। ज्यां की जीवन संगिनी का नाम बेला है और वो भी इनके जज्बे की प्रबल समर्थक हैं। जब वे दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स में पढ़ाते थे तब भी अपनी जीवन संगिनी के साथ तिमारपुर की झुग्गियों में रहते थे। ज्यां के अनुसार इकोनॉमिक्स और मैथ्स तभी सार्थक हैं, जब वह आम लोगों के काम आए और इसे समझने के लिए आम लोगों के बीच ही रहना पड़ता है। मैं पर्सनली ज्यां द्रेज और उनके काम को सलाम पेश करता हूं, वाकई आपकी जीवनशैली और आपका कार्य अद्भूत है।
