अरविंद शर्मा

बांकीपुर की हार चेतावनी थी और अब विधान परिषद के नतीजे खतरे का खुला ऐलान हैं। भाजपा अब भी नहीं जागी तो बिहार में नया सियासी समीकरण उसके वर्षों पुराने किलों को एक-एक कर ढाह सकता है। सत्ता की हनक, संगठन का भौकाल और शीर्ष नेतृत्व के रुतबा का हल्ला मचाकर मतदाताओं को हमेशा नहीं बहलाया जा सकता। बिहार में भाजपा का सबसे बड़ा संकट विपक्ष नहीं, बल्कि उसका आत्मविश्वास है जो अब अहंकार में बदलता दिख रहा है। महज दो महीने में दो परंपरागत गढ़ हाथ से निकलना सामान्य हार नहीं, बल्कि उस राजनीतिक जमीन के खिसकने का संकेत है जिस पर पार्टी तीन दशक से निश्चिंत खड़ी थी।
बांकीपुर में 1995 से कायम भाजपा का वर्चस्व प्रशांत किशोर ने तोड़ दिया। विडंबना यह कि यह वही सीट थी जिसे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने खाली किया था। तब पार्टी ने इसे अपवाद मानकर टाल दिया। लेकिन अब पटना शिक्षक विधान परिषद सीट पर नवल किशोर यादव का तीन दशक पुराना कब्जा भी खत्म हो गया। लालू-राबड़ी के दौर में भी भाजपा के पास रही यह सीट इस बार राजद के डा. संजीव कुमार के खाते में चली गई।
हालांकि नीतीश कुमार का औरा अभी बरकरार है। जदयू ने पटना स्नातक सीट फिर से जीतकर साबित कर दिया है कि उसकी हस्ती मिटाना आसान नहीं है। मगर भाजपा की हार ने उसकी कमजोर होती जड़ की ओर इशारा कर दिया है। राजनीति में चेतावनी बार-बार नहीं मिलती है। बांकीपुर की हार पहली घंटी थी, विधान परिषद की हार दूसरा सायरन। अब भी अनसुना किया तो आगे एक्सीडेंट तय है। आफत बोल कर नहीं आती है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।


