
उर्मिलेश
अपने समाज में ‘मुठभेड़’ के ज्यादा मामले ‘फ़र्जी’ होते हैं। इसके असंख्य उदाहरण हैं. ऐसी मुठभेड़ों को कत्तई जायज नहीं ठहराया जा सकता, चाहे मारा जाने वाला व्यक्ति ‘अपराधी’ ही क्यों न हो। बिहार के भोजपुर इलाके में जिस युवक को पुलिस ने कथित मुठभेड में मारा, उसे गिरफ्तार कर जेल में क्यों नहीं डाला गया? उस पर दंडात्मक कार्रवाई क्यों नहीं शुरू की गई? दशकों पहले बिहार में ‘फर्जी मुठभेड’ के समाचार आये दिन अखबारों में ‘रियल मुठभेड’ के तौर पर छपा करते थे। नवभारत टाइम्स के युवा रिपोर्टर के तौर पर पिछली शताब्दी के अस्सी दशक में हमने ऐसे कई फर्जी मुठभेड़ों का पर्दाफाश किया था। अन्य कई वरिष्ठ पत्रकारों ने भी इस तरह के मुठभेड कांडों पर खोजपरक खबरें छापी। धीरे-धीरे माहौल बदला और मुठभेड़ हत्याओं का सिलसिला थम सा गया।
बिहार में शासन को सतर्कता बरतने चाहिए ताकि अतीत के गलतियों की पुनरावृत्ति न हो। आंकड़े बताते हैं कि पिछले दो वर्ष में पटना, सीवान, भागलपुर, नवादा, समस्तीपुर, नालंदा और बेगूसराय सहित कई जिलों में फर्जी मुठभेड में युवाओं की हत्याएं हुई हैं।ज्यादातर मामलों में दलित और पिछड़े वर्ग के लोग ही निशाना बने। लेकिन उनके साथ हुई कथित मुठभेड़ की भयावह कथाएं मीडिया में प्रमुखता नहीं पा सकीं।
अब भोजपुर जिले में ऐसी ही एक भयानक घटना दर्ज हुई, जिसमें भाजपा-समर्थक और ब्राह्मण समुदाय के कथित विवादास्पद आचरण वाले एक युवक की जान चली गई। अगर पुलिस के पास उसके खिलाफ मामले लंबित थे तो उसे गिरफ्तार कर आवश्यक कार्रवाई शुरू की जानी चाहिए थी। हमारा मानना है कि भोजपुर की ‘मुठभेड-हत्या’ के साथ पिछले दो-तीन साल की ऐसी तमाम मुठभेड हत्याओं की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच बैठाई जानी चाहिए। सरकार को इस दिशा में त्वरित कारवाई करनी चाहिए ताकि यह सिलसिला फौरन रुके।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

