

रंजन सिन्हा





भाजपा की नई टीम में कई पुराने और अनुभवी चेहरों को जगह नहीं मिली है। इनमें संजय मयूख का नाम खास तौर पर चर्चा में है। संजय मयूख को पार्टी के उन नेताओं में माना जाता रहा है, जिन्होंने मीडिया और संगठन के बीच संवाद स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मीडिया के सवालों का सामना हो या पार्टी का पक्ष मजबूती से रखने की जिम्मेदारी उन्होंने लंबे समय तक अपनी भूमिका को बखूबी निभाया। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि इतने अनुभवी मीडिया मैनेजर को नई टीम से बाहर करने के पीछे आखिर क्या रणनीति है? क्या पार्टी अब नए चेहरों को आगे बढ़ाना चाहती है? या फिर बिहार भाजपा के संगठन में जातीय और सामाजिक समीकरण को नए सिरे से संतुलित किया जा रहा है?
बिहार की राजनीति में संगठन की टीम बनाते समय सिर्फ राजनीतिक अनुभव ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और सामाजिक समीकरण भी काफी मायने रखते हैं। इसलिए संजय मयूख की विदाई को इसी बड़े बदलाव के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। हालांकि एक बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि संजय मयूख ने मीडिया के मोर्चे पर पार्टी के लिए लंबे समय तक मेहनत की और अपनी एक अलग पहचान बनाई। पद आज है, कल नहीं भी हो सकता… लेकिन संगठन के लिए किए गए काम और अनुभव की अपनी कीमत होती है।
अब सवाल यही है-क्या नई टीम में जातीय-सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश में संजय मयूख जैसे अनुभवी चेहरे की भूमिका खत्म कर दी गई है, या पार्टी उन्हें किसी नई जिम्मेदारी के लिए तैयार कर रही है? क्योंकि राजनीति में दरवाजे बंद होना हमेशा कहानी का अंत नहीं होता… कभी-कभी नई भूमिका की शुरुआत भी यहीं से होती है।
