
Bodhgaya Myanmar Relations : म्यांमार के राष्ट्रपति जनरल मिन अंग हलाइंग इन दिनों अपनी पांच दिवसीय भारत यात्रा पर हैं। उनके साथ उनके कई कैबिनेट मंत्री, अधिकारी और बिजनेस लीडर हैं। यात्रा का उद्देश्य दोनों देशों के बीच आर्थिक और राजनयिक सहयोग को लेकर बातचीत पर है। वे दिल्ली में पीएम मोदी से मिलेंगे और भारत की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले महानगर मुंबई भी जायेंगे।
मगर अपनी यात्रा के पहले दो दिन उन्होंने बोधगया को दिये हैं। वहां के कल थे और आज भी रहेंगे। ऐसा वे सिर्फ इसलिए नहीं कर रहे कि वे बौद्ध हैं औऱ म्यांमार में बौद्ध धर्म के मानने वालों की बड़ी संख्या है। लगभग 90 फीसदी।
उसकी वजह यह है कि बोधगया के महाबोधि मंदिर से म्यांमार के लोगों का काफी पुराना लगाव है। इतना की उन्होंने तीन दफा इस महाबोधि मंदिर का जीर्णोद्धार कराया है, यहां काफी पहले से उनके अतिथिगृह हैं और अपने देश म्यांमार में भी उन्होंने महाबोधि मंदिर जैसा ही एक मंदिर बनवाया है।
यह रिश्ता काफी पुराना है। 12वीं सदी का। वैसे तो म्यांमार में बौद्ध धर्म की शुरुआत सम्राट अशोक के जमाने में ही हो गई थी। अशोक ने दो बौद्ध भिक्षुओं को वहां धम्म के
प्रचार के लिए भेजा था। तीसरी सदी आते-आते वहां के राजा भी बौद्ध होने लगे। निश्चित तौर पर वहां के बौद्ध धर्मावलंबी बोधगया आते होंगे।
तभी 1211 में वहां के बागान में तत्कालीन राजा हितिलोमिन्लो ने महाबोधि मंदिर जैसा ही मंदिर बनवाया, जो आज भी है।
1211 में जब म्यांमार में महाबोधि मंदिर जैसा मंदिर बन रहा था, बोधगया का महाबोधि मंदिर ध्वस्त हो रहा था। कई इतिहासकार इसके लिए तुर्क आक्रमणकारियों को दोषी मानते हैं, तो कई पाल वंश के पतन के बाद इस इलाके में सेन वंश के शासकों की उपेक्षा को, जो बौद्ध विरोधी थे। दिलचस्प है कि इसी अवधि में भारत से बौद्ध धर्म भी गायब होता चला गया। इसकी वजह क्या है, यह इतिहासकारों का विषय हैष मगर जब महाबोधि मंदिर ध्वस्त औऱ जर्जर होने लगा तो उसी दौरान यहां आये एक बर्मीज भिक्खु धम्मरक्षित ने यहां आकर इसकी थोड़ी बहुत रिपेयरिंग कराई। फिर संभवतः इस भिक्खु ने अपने देश लौटकर इसका जिक्र किया होगा, तब 1298 में वहां के राजा असोकमल्ल ने इसका अच्छे से जीर्णोद्धार कराया।
श्रीलंका के एक बौद्ध भिक्खु देवप्रिय वलीसिंहे जो लंबे अरसे तक महाबोधि सोसाइटी के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। उन्होंने लिखा है कि एक बार 1779 में भी बर्मीज शासकों ने इस मंदिर का संंपूर्ण जीर्णोद्धार कराया था। इस तरह हम देखते हैं कि उस दौर में जब भारत में बौद्ध धर्म लगभग विलुप्त हो चुका था, म्यांमार के राजाओं ने इस मंदिर की देखरेख की जिम्मेदारी निभाई। इस लिहाज से उनका इस मंदिर के प्रति लगाव स्वाभाविक है।
दिलचस्प है कि 1885 से 1937 तक म्यांमार जो तब बर्मा कहा जाता था, ब्रिटिश भारत का हिस्सा रहा है। तब भारतीय बड़ी संख्या में बर्मा जाते थे। वहां रोजगार करते थे। शरतचंद के उपन्यास श्रीकांत में नायक के कई बार रंगून जाने का जिक्र है। संभवतः इसी वजह से वह गाना बना, मेरे पिया गये रंगून।
बहरहाल 1937 में म्यांमार एक अलग कॉलोनी बन गया और फिर धीरे-धीरे भारत से उसकी दूरी बढ़ने लगी। इतनी कि अब म्यांमार हमारे लिए एक अबूझ पहेली जैसा है। 1970 के दशक में जब म्यांमार में राष्ट्रवादी आंदोलन बढ़ा तो वहां से भारतीय मूल के लोगों को भगाया जाने लगा।
ये भारतीय आज भी भारत की रिफ्यूजी कॉलोनियों में रहते हैं और म्यांमार को मिस करते हैं। ऐसी ही एक कॉलोनी पूर्णिया में मेरे गांव के पास है, मैं उनलोगों से मिला था। वे अभी भी बर्मीज भाषा में बात करते हैं।
अब जब वहां के राष्ट्रपति भारत के दौरे पर आये हैं, दोनों देशों के बीच फिर से संबंध विकसित हो तो यह एक अच्छी पहल होगी।

