
पढ़े-लिखे आदिवासी नेता थे दामू बानरा, 38 वर्ष पहले हासिल की थी बीएससी की डिग्री
चाईबासा : आजसू के वरिष्ठ नेता, झारखंड आंदोलनकारी तथा झारखंड आंदोलनकारी का सरकारी दर्जा प्राप्त दामू बानरा अपने समय के पश्चिमी सिंहभूम के प्रभावशाली आदिवासी नेताओं में गिने जाते थे। उन्होंने जिले में आजसू संगठन को मजबूत आधार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और लंबे समय तक चले झारखंड आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई। लगभग 38 वर्ष पूर्व दामू बानरा ने टाटा कॉलेज से विज्ञान संकाय में बैचलर ऑफ बीएससी की डिग्री हासिल की थी। उस दौर में आदिवासी समाज के किसी युवा का विज्ञान विषय में स्नातक होना एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। उन्होंने टाटा कॉलेज के सामान्य छात्रावास में रहकर इंटरमीडिएट ऑफ साइंस तथा बी.एससी. की पढ़ाई पूरी की। छात्र जीवन के दौरान ही वे सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों से जुड़े तथा अपने तेजतर्रार नेतृत्व के कारण पहचान बनाई। बाद में उन्होंने आजसू संगठन में महासचिव, संयोजक और जिलाध्यक्ष सहित कई महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारी निभाई।
भरभरिया में बीता बचपन
खूंटपानी प्रखंड के गाड़ा राजाबासा निवासी 60 वर्षीय दामू बानरा का ननिहाल तांतनगर प्रखंड के भरभरिया गांव में था। उनका मामा घर क्षेत्र के प्रसिद्ध इलाकाई मानकी कालीचरण बिरुवा के परिवार से जुड़ा है। दामू बानरा ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा ननिहाल में रहकर पूरी की। इसके बाद उन्होंने संत जेवियर्स बालक उच्च विद्यालय (प्लस-2), लुपुंगुटू से माध्यमिक शिक्षा प्राप्त की और मैट्रिक के बाद टाटा कॉलेज में प्रवेश लेकर स्नातक की उपाधि हासिल की।
ज्योत्सना तिर्की से हुआ विवाह
दामू बानरा का विवाह ज्योत्सना तिर्की से हुआ था। ज्योत्सना तिर्की मूल रूप से रांची जिले के कांके की रहने वाली थीं, जबकि उनका परिवार लंबे समय से चाईबासा में निवास करता था। वे एक सामाजिक संस्था (एनजीओ) का संचालन करती थीं। उनके पिता चाईबासा औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आईटीआई) में प्रशिक्षक (इंस्ट्रक्टर) के पद पर कार्यरत थे।
संतान सुख से रहे वंचित
दामू बानरा और उनकी पत्नी संतान सुख से वंचित रहे। बताया जाता है कि बाद में उन्होंने एक बच्चे को गोद लिया था। अपने जीवन के अंतिम वर्षों में वे चाईबासा के टुंगरी स्थित आदिवासी कॉलोनी में अपने निजी आवास में रह रहे थे।
चुनावी राजनीति में भी आजमाई किस्मत
दामू बानरा ने अपनी पत्नी ज्योत्सना तिर्की को एक बार नगरपालिका अध्यक्ष पद का चुनाव भी लड़वाया था, हालांकि उन्हें सफलता नहीं मिली। स्वयं दामू बानरा ने भी आजसू प्रत्याशी के रूप में चाईबासा विधानसभा सीट से ‘केला छाप’ चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ा, लेकिन वे भी जीत हासिल नहीं कर सके। चुनावी असफलताओं के बाद उन्होंने धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली और सार्वजनिक जीवन में उनकी सक्रियता कम होती चली गई। इसके बावजूद झारखंड आंदोलन और पश्चिमी सिंहभूम में आजसू संगठन को मजबूत करने में उनके योगदान को आज भी याद किया जाता है।

