1947 के बाद लगभग चार दशकों तक कांग्रेस ही केंद्र की सत्ता में बनी रही, तब हिन्दू-जागरण क्यों नहीं हुआ?

लेख में हिन्दू-चेतना, भाजपा की चुनावी सफलता और भारतीय राजनीति के बदलते समीकरणों पर सवाल उठाए गए हैं। विभाजन से लेकर राम मंदिर तक के मुद्दों का विश्लेषण किया गया।

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सुशोभित

हिन्दुत्व की विचारधारा बार-बार इस नैरेटिव को हमारे सामने रखती है कि साम्प्रदायिक-आधार पर हुए भारत-विभाजन से हिन्दू-चेतना उद्वेलित हो उठी थी और कांग्रेस की विचारधारा से उसका मोहभंग हो गया था। फिर क्या कारण है कि भारत-विभाजन 1947 में हुआ और भारतीय जनता पार्टी को पहली बार पूर्ण बहुमत 2014 में जाकर मिला? इतिहास में जातीय-चेतना के उद्वेलन की वैसी कौन-सी दूसरी मिसाल मिलती है, जिसने अपनी चुनावी-अभिव्यक्ति के लिए 67 साल प्रतीक्षा की हो? 1947 के बाद लगभग चार दशकों तक कांग्रेस ही केंद्र की सत्ता में क्यों बनी रही? हिन्दू-जागरण क्यों नहीं हुआ? किसने रोका था? 1951 के आम चुनाव में- जब विभाजन के घाव तरोताज़ा थे- तब भारतीय जनसंघ को केवल 3 सीटें मिली थीं और “देश का बँटवारा करवाने वाली कांग्रेस” को 364 सीटें! यह गणित कुछ समझ नहीं आता। हिन्दू-चेतना के उद्वेलन ने मुखर्जी-मोशाय के हिन्दू राष्ट्रवाद को तब वोट क्यों नहीं दिए थे? कालान्तर में, 2014 में जाकर ही भारतीयों को वैसी बुद्धि क्यों आई? इस तर्क-पद्धति को और आगे बढ़ाएँ तो बड़े रोचक विवरण सामने आते हैं। 1985 के शाहबानो प्रकरण से हिन्दू-चेतना उद्वेलित हुई, लेकिन सरकार जनता दल की बनी। कांग्रेस की सरकार गई ज़रूर, लेकिन इसके बावजूद उसे 197 सीटें मिलीं, जो भारतीय जनता पार्टी की 85 सीटों से दोगुनी से भी ज़्यादा थीं। हिन्दू-चेतना उस समय शाहबानो के बजाय भ्रष्टाचार पर ज़्यादा उद्वेलित हुई थी और विश्वनाथ प्रताप सिंह के सिर पर ताज रखा गया था। अफ़सोस कि हिन्दू-चेतना अब भ्रष्टाचार पर उद्वेलित नहीं होती।

1990 में कश्मीर से पंडितों का पलायन हुआ। 1991 के आम चुनाव में कांग्रेस (232) को भारतीय जनता पार्टी (120) से 100 से भी ज़्यादा सीटें मिलीं। हिन्दू-चेतना तब कश्मीरी पंडितों पर पर्याप्त उद्वेलित नहीं हुई या अगर हुई तो चुनावी-राजनीति में उसका असर नहीं दिखा? 2002 में गोधरा कांड हुआ और 2004 में केंद्र से भाजपा-नीत अटल सरकार ने सत्ता गँवा दी। 2024 में अयोध्या में राम मंदिर बना और केंद्र में भाजपा-नीत सरकार ने बहुमत गँवा दिया।

ये माजरा क्या है? अगर हिन्दू-चेतना का उद्वेलन ही भारतीय जनता पार्टी की सबसे बड़ी राजनैतिक पूँजी है तो ये तमाम पराजयें क्यों होती रहीं? भारत के लोगों ने दूसरी पार्टियों में लगातार भरोसा क्यों जताया? क्या हिन्दू-चेतना और भारतीय-चेतना में अंतर है? या क्या हिन्दू-चेतना का उद्वेलन प्रचार-तंत्र से भड़काई गई वस्तु है, जिसकी जड़ें ज़मीन में इतनी गहरी नहीं, जितनी कि बताई जाती हैं? जब हिन्दुत्व की विचारधारा बार-बार हमें भारत-विभाजन, शाह बानो, कश्मीरी-पंडितों, गोधरा, राम मंदिर की याद दिलाती है तो भारतीय-जनमत की अभिव्यक्तियों में इन प्रश्नों की झलक क्यों नहीं दिखलाई देती थी? क्या कारण था कि भारतीय-समाज ने सात दशकों तक भारतीय जनता पार्टी को बहुमत से वंचित रखा? अटल जी जैसा सौम्य-उदार चेहरा आगे बढ़ाने पर भी इन लोगों को कभी पूर्ण बहुमत देश की जनता ने नहीं दिया। क्यों? या तो इस हिन्दू-चेतना के उद्वेलन में कुछ कृत्रिमता है, स्वाभाविकता नहीं है- होती तो वह 1951, 1989, 1991 में और प्रखर रूप से दिखलाई देती। या वह अनवरत दुष्प्रचार और प्रोपगंडा से उघाड़ी गई, कुरेदी गई भावना है। या फिर हिन्दू-चेतना अकेले ही भारतीय जनता पार्टी को चुनाव नहीं जिता रही है, कुछ और भी कारण हैं। मगर कौन-से? क्या ही आश्चर्य है कि बंगाल में ‘हिन्दू-जागरण’ हुआ और इसके बावजूद ममता बनर्जी 41 प्रतिशत वोट पा गईं और वो भी एसआईआर, केन्द्रीय-बलों के जमावड़े और सत्ता द्वारा बेशुमार संसाधन-ताक़त झोंक देने के बावजूद, बांग्लादेश में हुई घटनाओं के बावजूद! हमें इन तमाम ज्वलन्त प्रश्नों को सार्वजनिक विमर्श में जमकर सामने रखना चाहिए।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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विनीता चौबे को 10 साल का अनुभव है। उन्होनें सन्मार्ग से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर न्यूज विंग, बाइस स्कोप, द न्यूज पोस्ट में भी काम किया। वे राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं से जुड़ी खबरों को सरल और तथ्यात्मक भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका प्रयास रहता है कि जमीनी स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को सही और विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों तक पहुंचाया जाए।