
प्रियंका ओम
जमशेदपुर के जिस मुहल्ले में इम्तियाज़ अली रहते थे, उसे मानगो (अंग्रेज़ी वर्तनी — Mango) कहते थे-हैं। जमशेदपुर यानी टाटानगर को एक पुल दो भागों में बाँटता भी है और जोड़ता भी है, जिसे मानगो पुल कहते हैं। इस पुल के उस तरफ़ मानगो है और इस तरफ़ साकची के बाद आदित्यपुर तक फैलाव है। यूँ अब मानगो भी फैलता-पसरता जा रहा है। उन दिनों इस तरफ़ की लड़कियाँ और स्त्रियाँ पुल पार नहीं करती थीं। लड़के-पुरुष भी शाम के बाद उधर का रुख़ नहीं करते थे (स्थानीय लोग इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखते होंगे)।
सड़क मार्ग से राँची जाने के लिए इस पुल के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था और हम महीने में एक बार ज़रूर राँची जाते थे। तब मानगो कस्बा दिखता था। हालाँकि अधिक याद नहीं है कि कैसा था, क्या था, किंतु अब वह ‘मिनी दुबई’ कहलाता है। तमाम लेटेस्ट गाड़ियाँ आपको उधर की संकरी गलियों से निकलती दिख जाएँगी; आधुनिक किचन वाले घर, नीले काँच से बंद खिड़कियाँ, अरेबिक मेहराबों और नामों वाले अपार्टमेंट, कई छोटी-बड़ी मस्जिदें, जहाँ से आती अज़ान की धीमी आवाज़। चमकीले कपड़ों से लकदक, बच्चों का हाथ थामे, ऊद की ख़ुशबू बिखेरती, सऊदी की कमाई का मुज़ाहिरा करती स्त्रियाँ; इम्पोर्टेड सूखे फलों और खजूर के सौदे की दुकानें। इतने स्नैक्स कॉर्नर और रेस्तराँ कि आपका मन अकबका जाए कि कहाँ जाएँ और क्या लें। और मोहब्बत वाली चाय की एक आधुनिक टपरी भी वहीं मिलेगी आपको!
ख़ैर, हुआ यह कि शहर के पैक्ड हो जाने के कारण सभी मल्टीप्लेक्स और मॉल मानगो में ही विकसित हुए। उतना बड़ा बिग बाज़ार मैंने किसी महानगर में भी नहीं देखा। हालाँकि कई बरस पहले बिग बाज़ार किसी और बाज़ार में तब्दील हो गया, जिसका नाम मुझे याद नहीं। शहर के दूसरे छोर से लड़के-लड़कियाँ फ़िल्म के बहाने मानगो आते और परिवार ख़रीदारी करने, वहीं कुछ खाकर लौट जाते। बिग बाज़ार एक तरह का मॉल-कल्चर रिवोल्यूशन था जमशेदपुर में। बाद में शहर के दूसरे किनारे, आदित्यपुर में, प्रकाश झा ने 2017 में P&M मॉल बनवाया, जिसमें आज तक मेरा जाना नहीं हो सका है।
लब्बोलुआब यह है कि जिस मानगो की राह पकड़ने से लोग-बाग डरा करते थे, वही मानगो शहर का अड्डा हो गया। मेरा भी शादी के बाद पुनः उसी जमशेदपुर में लौटना हुआ, जहाँ मेरा बचपन बीता था। जब घर लेने की बात आई तो हमने डेवलपिंग एरिया मानगो चुना। इसका एक कारण उस सोसायटी का हाईवे पर होना था और दूसरा, बिग बाज़ार का घर के पास होना। उधर रहने से राँची जाने में आधे घंटे से पैंतालीस मिनट तक की बचत हो जाती है और राँची तो जाना-आना लगा ही रहता है, क्योंकि जमशेदपुर में कमर्शियल एयरपोर्ट नहीं है; उड़ानें राँची से ही होती हैं। तो क्या हुआ कि जेआरडी टाटा भारत के पहले पायलट थे! इम्तियाज़ अली हमारे ही स्कूल से हैं, हालाँकि वे हमसे बहुत सीनियर थे। उन दिनों उनके बारे में कोई विशेष जानकारी नहीं थी; वे आम स्टूडेंट्स की तरह ही थे किंतु स्टार निर्देशक बनने के बाद डीबीएमएस के विद्यार्थी इम्तियाज़ अली, माधवन, सिमोन सिंह और तनुश्री दत्ता जैसे कलाकारों के नाम लेते हुए रील बना रहे हैं और वायरल हो रहे हैं। दरअसल, यह भी एक सुंदर बात है।

