
शुभनीत कौशिक
आज़ादी की लड़ाई में भागीदारी करते हुए राष्ट्रीय नेतृत्व ने स्थानीय, प्रांतीय और राष्ट्रीय स्तर पर प्रशासन के कामों में भागीदारी को आम जनता से सीधे जुड़ने और शासन-प्रशासन की भूमिकाओं में प्रशिक्षित होने के लिए भी ज़रूरी समझा था। बीसवीं सदी के तीसरे दशक के आरम्भ में जवाहरलाल नेहरू ने भी प्रशासन से जुड़ी एक ऐसी ही ज़िम्मेदारी को सँभाला, जब वे अप्रैल 1923 में इलाहाबाद नगरपालिका बोर्ड के अध्यक्ष बने। तब केवल 34 बरस के नेहरू के लिए सार्वजनिक जीवन में प्रशासनिक दायित्व संभालने का यह पहला ही अवसर था। इस पद पर रहते हुए उन्होंने न केवल अपनी जिम्मेदारी का बखूबी निर्वहन किया बल्कि इलाहाबाद के आम लोगों की सुविधाओं का समुचित ख्याल रखने की भी पूरी कोशिश की। नगरपालिका के काम को नेहरू ने स्वराज की तैयारी और उसके प्रशिक्षण के लिए ज़रूरी संघर्ष और रचनात्मक कार्यक्रम से जोड़ कर देखा। नगरपालिका अध्यक्ष के रूप में नेहरू द्वारा अधिकारियों से किए गए पत्राचार, नगरपालिका बोर्ड की बैठकों में उनके द्वारा प्रस्तुत की गई तिमाही और सालाना रिपोर्टें नेहरू की प्रशासनिक क्षमता और उनके विजन का भी परिचय देती हैं।
इलाहाबाद शहर और वहाँ के लोगों को स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए वे तत्पर रहे। नेहरू ने इक्कीस महीने के अपने कार्यकाल में नगरपालिका को राष्ट्रवादी विचारों के अनुरूप संचालित करने की कोशिश की और सरकारी हस्तक्षेप को कम से कम रखने का प्रयास किया। इलाहाबाद के घनी आबादी वाले इलाक़ों के विकास, कुंभ मेले में आने वाले यात्रियों की सुविधाओं का ख़्याल, शहर की सफ़ाई, कूड़े और अपशिष्ट जल का प्रबंधन, शहर में वेश्यावृत्ति का मसला – ये ऐसे बिंदु थे, जिन पर नेहरू ने नगरपालिका का अध्यक्ष रहते हुए ज़रूरी हस्तक्षेप किया। कर, राजस्व और व्यय जैसे महत्त्वपूर्ण आर्थिक सवालों पर सोचते हुए नेहरू आर्थिक राष्ट्रवाद की विचारधारा को अमली जामा पहनाते हुए भी नज़र आते हैं। इन ज्वलंत सवालों पर सोचते हुए उन्होंने देश-विदेश के उदाहरणों से भी सीख हासिल करने पर ज़ोर दिया। जो तब के राष्ट्रीय नेतृत्व के विजन और उनकी विश्व-दृष्टि की व्यापकता का भी प्रमाण है।

