
झारखंड: आजसू पार्टी के केंद्रीय महासचिव एवं प्रवक्ता संजय मेहता ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि झारखंड सरकार द्वारा निजी क्षेत्र में स्थानीय युवाओं को 75 प्रतिशत आरक्षण देने का जोर-शोर से प्रचारित किया जा रहा दावा पूरी तरह से झूठा और फर्जी साबित हो गया है।
माननीय झारखंड उच्च न्यायालय ने झारखंड नियोक्ता (स्थानीय उम्मीदवारों की नियुक्ति) अधिनियम, 2021 तथा इसके नियमावली 2022 पर अंतरिम रोक पूर्व में ही लगा दी है। इस महत्वपूर्ण जानकारी की पुष्टि स्वयं झारखंड सरकार के श्रम, नियोजन, प्रशिक्षण एवं कौशल विकास विभाग के नियोजन पदाधिकारी, संयुक्त द्वारा जारी आधिकारिक पत्र (पत्रांक-16/PG Portal-01/2026) से भी हुई है।
क्या कहते हैं संजय मेहता
संजय मेहता ने बताया कि हम शुरू से यह कहते रहे हैं कि सरकार बिना किसी कानूनी, व्यावहारिक और आर्थिक अध्ययन के केवल वोट बैंक की राजनीति के लिए यह अधिनियम लाई थी। सरकार की इच्छा शक्ति इसे लागू करने की नहीं है। सरकार का 75% आरक्षण वाला पूरा दावा जुमला साबित हो गया है। सरकार के ही बनाये कानून का अपमान राज्य में स्थापित निजी क्षेत्र की कंपनियों ने किया और सरकार कुछ नहीं कर पायी।
संजय मेहता ने बताया की शिकायत संख्या GOVJH/E/2026/0002286 (दिनांक 15 अप्रैल 2026) के जवाब में सरकार ने ख़ुद स्वीकार किया है की इस नियमावली और क़ानून पर अंतरिम रोक लगायी गयी है। संजय मेहता के पत्र पर सरकार ने जवाबी पत्र जारी किया।
झारखंड उच्च न्यायालय में दायर याचिका संख्या WPC-5688/2024 (झारखंड स्मॉल इंडस्ट्रीज एसोसिएशन बनाम झारखंड राज्य एवं अन्य) में 11 दिसंबर 2024 को पारित आदेश के आलोक में यह अंतरिम रोक लगाई गई है। इस रोक के बाद निजी क्षेत्र की सभी कंपनियों, फैक्टरियों, उद्योगों और संस्थानों पर 75% स्थानीय उम्मीदवारों की नियुक्ति का बंधन फिलहाल लागू नहीं होगा।
संजय मेहता ने कहा की हमने झारखंड सरकार से बार-बार पूछा है कि निजी क्षेत्र में 75 प्रतिशत स्थानीय आरक्षण का प्रावधान कितने युवाओं को मिला? जिन क्षेत्रों और कंपनियों में यह लागू नहीं हुआ, वहाँ तुरंत 75 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जाए।
सरकार का जवाब है कि उसने “झारखंड राज्य के निजी क्षेत्र में स्थानीय उम्मीदवारों का नियोजन अधिनियम 2021” एवं “नियमावली 2022” बनाया है। लेकिन इस कानून को झारखंड उच्च न्यायालय में चुनौती दे दी गई है। वाद संख्या: WPC-5688/2024 के माध्यम से।
Jharkhand Small Industries Association through its President Anjay Pacheriwala and Ors. Vs. The State of Jharkhand and Ors.
सरकार का तर्क है की उक्त मामले में माननीय झारखंड उच्च न्यायालय ने दिनांक 11.12.2024 को इस कानून के अनुपालन पर अंतरिम रोक लगा दी है। इस पर संजय मेहता ने कहा की इसका स्पष्ट मतलब है कि एक तरफ सरकार ने कानून बनाया, दूसरी तरफ कंपनियां हाईकोर्ट चली गईं और साफ कह दिया कि हम स्थानीय झारखंडियों को 75% नौकरियां नहीं देंगे।
ऐसे में मुख्यमंत्री को स्वयं इन वाद दायर करने वाले उद्योगपतियों और कंपनी मालिकों को आमंत्रित कर स्पष्ट संदेश देना चाहिए था कि सुरक्षा हम देते हैं, जमीन झारखंडियों ने दी, विस्थापन झारखंडियों का हुआ, प्रदूषण झारखंडी झेल रहे हैं, फिर नौकरियां स्थानीय युवाओं को क्यों नहीं दी जाएंगी?
अगर कंपनियां स्थानीय युवाओं को नौकरियां देने को तैयार नहीं हैं तो सरकार को अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए प्रदूषण नियंत्रण, परिवहन, सुरक्षा, कानून-व्यवस्था आदि आधारों पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए थी। कंपनियों को कम से कम नैतिकता के आधार पर भी स्थानीय को नौकरी देने का दबाव देना चाहिए था।
दुर्भाग्यपूर्ण है कि झारखंड सरकार इन मनमाने व्यवहार करने वाली कंपनियों के सामने घुटने टेक चुकी है। उल्टा मुख्यमंत्री जी कहते हैं कि “निजी कंपनियां 75% नौकरियां नहीं देतीं तो लूट लो”। क्या सरकार अराजकता पैदा करना चाहती है।
सौ बात की एक बात है की झारखंड सरकार का निजी क्षेत्र में 75 प्रतिशत स्थानीय युवाओं को नौकरी देने का वादा पूरी तरह झूठा साबित हुआ है। सरकार को युवाओं को बरगलाना बंद करना चाहिए।

