
धनबाद। धनबाद के टुंडी जंगल में ‘पाषाण युग’ जैसी जिंदगी जी रहे 75 वर्षीय बुजुर्ग, स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता की अनोखी मिसाल
आज की 5G और आधुनिक सुविधाओं से लैस दुनिया में जहां लोग बिजली, मोबाइल और इंटरनेट के बिना कुछ घंटे भी नहीं रह पाते, वहीं धनबाद जिले के टुंडी प्रखंड के घने जंगलों में एक बुजुर्ग पिछले 25 वर्षों से प्रकृति के बीच बिल्कुल अकेले जीवन बिता रहे हैं।
यह कहानी है 75 वर्षीय सुरेंद्र सोरेन की, जिन्होंने अपनों को खोने के दर्द के बाद समाज और आधुनिक दुनिया से दूरी बना ली और जंगल को ही अपना स्थायी ठिकाना बना लिया।
मिट्टी की झोपड़ी ही बन गई पूरी दुनिया
टुंडी के कमलपुर क्षेत्र के जंगलों के बीच एक छोटी सी मिट्टी और पत्थर की झोपड़ी है। यही झोपड़ी पिछले कई वर्षों से सुरेंद्र सोरेन का घर है।
बिखरे बाल, लंबी सफेद दाढ़ी और कमजोर शरीर के साथ सुरेंद्र अब उम्र के अंतिम पड़ाव पर हैं। उनकी संपत्ति के नाम पर सिर्फ कुछ सूखी लकड़ियां, मिट्टी का चूल्हा और पुराने बर्तन हैं।
वे अब ठीक से बोल भी नहीं पाते, लेकिन उनकी खामोशी और जीवनशैली उनके संघर्ष, दर्द और वैराग्य की पूरी कहानी बयां कर देती है।
दुख ने बदल दिया जिंदगी का रास्ता
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार सुरेंद्र सोरेन कभी टुंडी के बसहा गांव में अपने परिवार के साथ सामान्य जीवन बिताते थे। उनका भरा-पूरा परिवार था और जिंदगी सामान्य तरीके से चल रही थी।
लेकिन एक हादसे ने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी। उनके दो मासूम बेटों की मौत सांप के काटने से हो गई। इस घटना ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया।
अपनों को खोने के गहरे सदमे के बाद उनका मन समाज और दुनिया से पूरी तरह उचट गया। इसके बाद वे अपनी पत्नी के साथ जंगल में रहने आ गए।
करीब सात-आठ वर्ष पहले पत्नी की भी मौत हो गई, लेकिन सुरेंद्र ने जंगल नहीं छोड़ा। तब से वे पूरी तरह अकेले ही जिंदगी गुजार रहे हैं।
स्वाभिमान ऐसा कि मदद भी नहीं लेते
सुरेंद्र सोरेन की जिंदगी का सबसे बड़ा पहलू उनका आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता है।
हाल ही में जब कुछ लोगों और मीडिया टीम ने उन्हें आर्थिक सहायता देने की कोशिश की, तो उन्होंने साफ तौर पर पैसे लेने से इनकार कर दिया। वे किसी के सामने हाथ फैलाना पसंद नहीं करते।
ग्रामीण बताते हैं कि कई बार उन्हें गांव वापस लाने का प्रयास किया गया, लेकिन वे हर बार मना कर देते हैं।
स्थानीय निवासी राजीव ओझा कहते हैं कि सुरेंद्र अब अपनी अंतिम सांस तक जंगल में ही रहना चाहते हैं। वे न किसी से शिकायत करते हैं और न ही किसी से कोई उम्मीद रखते हैं।
खुद खोदा कुआं, खुद तैयार किया खेत
घने जंगल में रहने के बावजूद सुरेंद्र पूरी तरह आत्मनिर्भर हैं।
पीने और खाना बनाने के लिए उन्होंने अपने हाथों से पांच से छह फीट गहरा कुआं खोदा है। इसके लिए उन्होंने किसी मशीन या आधुनिक साधन का इस्तेमाल नहीं किया।
उनके पास न हल है, न बैल और न ही खेती के आधुनिक उपकरण। इसके बावजूद उन्होंने जंगल के बीच अपने दम पर छोटा सा खेत तैयार किया है।
वे जंगल से मिलने वाले कंदमूल, जंगली आलू और जंगली चावल को भोजन के रूप में इस्तेमाल करते हैं। खुद लकड़ियां चुनते हैं और मिट्टी के चूल्हे पर खाना बनाकर जीवन यापन करते हैं।
आधुनिक दौर में आत्मनिर्भरता की अनोखी मिसाल
सुरेंद्र सोरेन की कहानी सिर्फ एक बुजुर्ग की अकेली जिंदगी नहीं है, बल्कि यह गहरे दुख, वैराग्य और आत्मनिर्भरता की अनोखी मिसाल है।
जब आज का समाज सुविधाओं और भौतिकता के पीछे भाग रहा है, तब सुरेंद्र ने प्रकृति के बीच बेहद साधारण जीवन को अपनाकर यह साबित किया है कि इंसान कम संसाधनों में भी आत्मसम्मान और संतोष के साथ जी सकता है।
उनकी जिंदगी यह भी सोचने पर मजबूर करती है कि अपनों को खोने का दर्द इंसान को किस हद तक बदल सकता है, और कैसे कुछ लोग पूरी दुनिया से दूर होकर प्रकृति को ही अपना सहारा बना लेते हैं।

