वरीयता सूची में नाम छूटने से अटका था प्रमोशन
मनोज कुमार सिंह की नियुक्ति वर्ष 1997 में तृतीय श्रेणी के लिपिकीय संवर्ग में हुई थी। वर्ष 2003 में उन्होंने देवघर हिंदी विद्यापीठ से साहित्य अलंकार की डिग्री प्राप्त की। वर्ष 2012 में सहायक अनुभाग पदाधिकारी के पद पर प्रमोशन के लिए पात्र होने के बावजूद उनका नाम वरीयता सूची में शामिल नहीं होने के कारण उन्हें प्रमोशन नहीं मिल सका। वहीं, एक अक्टूबर 2012 को उनके कनिष्ठ कर्मचारियों को इस पद पर प्रमोशन दे दिया गया था।
बाद में उनकी शैक्षणिक योग्यता की वैधता को लेकर भी विवाद हुआ। राज्य सरकार ने 26 फरवरी 2015 को साहित्य अलंकार की डिग्री को अमान्य करने संबंधी पत्र जारी किया था। इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
डिग्री को लेकर सरकार के फैसले में हुआ बदलाव
हाईकोर्ट ने 10 मई 2022 को संबंधित मामले में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि डिग्री को अमान्य करने का निर्णय पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू नहीं होगा। इसके बाद राज्य सरकार ने 15 जून 2023 को पत्र जारी कर 26 फरवरी 2015 से पहले प्राप्त ऐसी डिग्रियों को मान्य किया।
इसके बाद 20 सितंबर 2024 के विभागीय आदेश से मनोज कुमार सिंह को एक अक्टूबर 2012 से सहायक अनुभाग पदाधिकारी के पद पर काल्पनिक प्रमोशन दिया गया। हालांकि, उन्हें इस अवधि का वास्तविक वित्तीय लाभ नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
कर्मचारी की गलती नहीं होने पर लाभ रोकना उचित नहीं
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि झारखंड वित्त नियमावली के नियम 74 और झारखंड सेवा संहिता के नियम 58 के आधार पर भी ऐसी परिस्थिति में कर्मचारी को वित्तीय लाभ देने से इनकार नहीं किया जा सकता।
सरकार को संशोधित अधिसूचना जारी करने का निर्देश
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को मनोज कुमार सिंह को एक अक्टूबर 2012 से सहायक अनुभाग पदाधिकारी के पद का वित्तीय लाभ देने का निर्देश दिया है। इसके लिए 20 सितंबर 2024 और 24 सितंबर 2025 के संबंधित आदेशों में आवश्यक संशोधन करना होगा।
इसके अलावा, अनुभाग पदाधिकारी के पद पर प्रमोशन की तिथि 24 सितंबर 2025 के स्थान पर 4 दिसंबर 2020 करने के लिए शुद्धिपत्र जारी करने का आदेश दिया गया है। यह वही तारीख है, जिस दिन उनके कनिष्ठ कर्मचारी को इस पद पर प्रमोशन मिला था।
अदालत ने सभी लागू परिणामी लाभ देने का निर्देश देते हुए मनोज कुमार सिंह की रिट याचिका स्वीकार कर ली।


