
1999 Firing Case : झारखंड हाईकोर्ट (Jharkhand High Court) ने वर्ष 1999 के एक पुराने फायरिंग मामले में अहम फैसला सुनाते हुए आरोपी मदन मरांडी को बड़ी राहत दी है।
अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपी की ठोस पहचान और आरोपों को सही तरीके से साबित नहीं कर सका।
इसी आधार पर High Court ने निचली अदालत के आदेश को पलटते हुए आरोपी को बरी कर दिया और सत्र न्यायालय द्वारा दी गई सजा को रद्द कर दिया।
हाईकोर्ट का निष्कर्ष
High Court की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि मामले में प्रस्तुत साक्ष्य कमजोर हैं और गवाहों की कमी के कारण अभियोजन का पक्ष मजबूत नहीं माना जा सकता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल आरोप के आधार पर किसी को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं है।
निचली अदालत का फैसला
इससे पहले दुमका की सत्र अदालत ने आरोपी को IPC की धारा 307 और Arms Act की धारा 27 के तहत दोषी ठहराते हुए 10 वर्ष और 2 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
इस आदेश के खिलाफ 18 सितंबर 2003 को हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दाखिल की गई थी।
क्या था पूरा मामला
अभियोजन के अनुसार, 16 अगस्त 1999 की रात करीब 11 बजे सूचक सुनीलाल हांसदा पर उनके घर में सोते समय गोली चलाई गई थी। आरोप था कि मदन मरांडी ने कनपटी के पास गोली चलाई और फिर मौके से फरार हो गया।
जांच में सामने आई कमियां
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि आरोपी से कोई हथियार या आपत्तिजनक वस्तु बरामद नहीं हुई। साथ ही, घटना के पीछे बताया गया विवाद भी दो साल पुराना और सामान्य था, जिसे हत्या के प्रयास का ठोस कारण नहीं माना जा सकता।
छात्र की नजर से
यह फैसला बताता है कि न्याय व्यवस्था में सबूतों का बहुत महत्व है। जब तक आरोप सही तरीके से साबित न हों, तब तक किसी को दोषी ठहराना उचित नहीं माना जा सकता। यह निर्णय न्याय के सिद्धांतों को मजबूत करता है।

