रांची : श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट और विश्व हिंदू परिषद सेवा विभाग के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने कहा है कि भारतीय सनातन संस्कृति में अनेक पर्व और व्रत ऐसे हैं जिनमें पारिवारिक सुख, संतान की मंगलकामना और मातृप्रेम की अद्भुत अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। इन्हीं महत्वपूर्ण पर्वों में जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे जितिया अथवा जिउतिया व्रत भी कहा जाता है, विशेष स्थान रखता है। इस वर्ष जीवित्पुत्रिका व्रत 3 अक्टूबर, शनिवार को आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाएगा।जीवित्पुत्रिका व्रत मुख्य रूप से माताएं अपनी संतान की दीर्घायु, आरोग्य,सुख-समृद्धि, उन्नति एवं सुरक्षित जीवन की मंगलकामना से करती हैं। यह अत्यंत कठिन व्रत माना जाता है, जिसमें अनेक महिलाएं पूरे दिन और रात्रि तक निर्जला उपवास रखती हैं। बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश सहित अनेक क्षेत्रों में यह पर्व विशेष श्रद्धा एवं आस्था के साथ मनाया जाता है। नेपाल में भी यह जितिया व्रत के रूप में लोकप्रिय है। जीवित्पुत्रिका व्रत की प्रसिद्ध कथा राजा जीमूतवाहन, पक्षीराज गरुड़ और नाग शंखचूड़ से जुड़ी है। कथा के अनुसार नागवंश को गरुड़ के भय से बचाने के लिए जीमूतवाहन ने शंखचूड़ के स्थान पर स्वयं को बलिदान के लिए प्रस्तुत कर दिया। गरुड़ ने जीमूतवाहन को नाग समझकर उठा लिया, किंतु उनके अद्भुत त्याग और परोपकार से प्रभावित होकर सत्य का ज्ञान हुआ। इसके बाद गरुड़ ने नागों को अभय प्रदान किया और पूर्व में मारे गए नागों को अमृत के प्रभाव से पुनर्जीवन मिला।यह कथा त्याग, करुणा, परोपकार, साहस और प्राणीमात्र के प्रति दया का संदेश देती है। इसी कारण जीवित्पुत्रिका व्रत को संतान की रक्षा और दीर्घायु की कामना से जुड़े पवित्र व्रत के रूप में श्रद्धापूर्वक देखा जाता है। व्रती महिलाएं प्रातः स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करती हैं और संकल्प लेकर विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करती हैं। भगवान वासुदेव की पूजा, व्रत-कथा का श्रवण तथा पारंपरिक रूप से जीवित्पुत्रिका से संबंधित पूजन किया जाता है। विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय परंपराओं के अनुसार पूजा-विधि और प्रसाद में अंतर भी देखने को मिलता है। जीवित्पुत्रिका व्रत केवल उपवास या धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मां के त्याग, वात्सल्य, विश्वास और संतान के प्रति अटूट प्रेम की जीवंत अभिव्यक्ति है। यह पर्व परिवार में संस्कार, श्रद्धा और पारस्परिक स्नेह को मजबूत करने का संदेश देता है। माताएं अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य और मंगलमय जीवन के लिए कठिन तपस्या करती हैं, जो भारतीय संस्कृति में मातृत्व की गरिमा को रेखांकित करता है।अतः जीवित्पुत्रिका व्रत भारतीय लोकपरंपरा और सनातन आस्था का ऐसा पर्व है, जिसमें मां की प्रार्थना, त्याग और संतान के प्रति असीम स्नेह एक साथ दिखाई देता है। यह पर्व हमें परोपकार, करुणा, संयम और परिवार के प्रति अपने दायित्वों का स्मरण कराता है।



