नौ साल पुराने विज्ञापन पर फिर साक्षात्कार, कोर्ट के आदेश से JPSC का फैसला

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Jharkhand High Court: झारखंड में प्रतियोगिता परीक्षाओं को लेकर एक बार फिर न्यायालय के हस्तक्षेप की वजह से नियुक्ति प्रक्रिया चर्चा में है।

झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) की कई परीक्षाएं ऐसी रही हैं, जिन्हें झारखंड उच्च न्यायालय (Jharkhand High Court) के आदेश के बाद पूरा किया गया।

इसी क्रम में अब एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसमें विज्ञापन जारी होने के करीब नौ साल बाद और नियुक्ति प्रक्रिया पूरी होने के सात साल बाद कुछ अभ्यर्थियों के लिए दोबारा साक्षात्कार कराया जाएगा।

2016 के विज्ञापन से जुड़ा है पूरा मामला

JPSC ने वर्ष 2016 में खाद्य सुरक्षा पदाधिकारी के 24 पदों पर बहाली के लिए प्रक्रिया शुरू की थी। इस प्रक्रिया के तहत नवंबर 2023 में साक्षात्कार भी आयोजित हुआ और परिणाम जारी होने के बाद नियुक्ति प्रक्रिया पूरी कर ली गई। लेकिन इस बीच चार अभ्यर्थियों का मामला कोर्ट में लंबित रहा।

इन चार अभ्यर्थियों—चंद्रशेखर सिंह, भोला शंकर, रविशंकर और उमेश कुमार—को लिखित परीक्षा में सफल होने के बावजूद उनकी डिग्री के आधार पर आयोग ने अयोग्य घोषित कर दिया था।

इस फैसले को अभ्यर्थियों ने झारखंड उच्च न्यायालय में चुनौती दी। मामले की सुनवाई के बाद कोर्ट ने आयोग को निर्देश दिया कि इन अभ्यर्थियों के लिए साक्षात्कार आयोजित किया जाए।

हाईकोर्ट के आदेश के आलोक में जेपीएससी ने अब इन चारों अभ्यर्थियों के लिए 6 जनवरी 2026 को साक्षात्कार कराने का निर्णय लिया है। अभ्यर्थी 20 दिसंबर से साक्षात्कार के लिए अपना कॉल लेटर डाउनलोड कर सकेंगे।

आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि अगर इन अभ्यर्थियों को साक्षात्कार में उतने या उससे अधिक अंक मिलते हैं, जितने पहले से चयनित अभ्यर्थियों की मेधा सूची में सबसे नीचे वाले उम्मीदवार को मिले थे, तो उनकी नियुक्ति संभव होगी।

56 नए पदों का परिणाम अभी बाकी

इधर, स्वास्थ्य विभाग की मांग पर JPSC ने वर्ष 2023 में खाद्य सुरक्षा पदाधिकारी के 56 नए पदों के लिए भी बहाली प्रक्रिया शुरू की है। इसके तहत 27 मई 2024 को लिखित परीक्षा आयोजित की जा चुकी है, लेकिन अब तक इसका परिणाम जारी नहीं हुआ है।

इस मामले में कोर्ट ने यह भी साफ किया है कि वर्ष 2016 के विज्ञापन से जुड़े अभ्यर्थियों को 2023 की इस नई परीक्षा में शामिल होने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि उन्होंने इसके लिए आवेदन नहीं किया था।

इस तरह, यह पूरा मामला दिखाता है कि न्यायालय के आदेशों के चलते कई बार वर्षों बाद भी नियुक्ति प्रक्रियाओं में बदलाव देखने को मिलता है।

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