
नई दिल्ली/बेंगलुरु: उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति उज्जवल भुइयां ने कहा है कि असहमति को अपराध घोषित करने, आतंकवाद रोधी कानून यूएपीए के तहत अंधाधुंध गिरफ्तारियों और ‘‘गहरी सामाजिक दरारों’’ के माध्यम से 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता है। रविवार को बेंगलुरु में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन में न्यायमूर्ति भुइयां ने उच्च न्यायपालिका में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व पर अफसोस व्यक्त किया। उन्होंने इसकी तुलना देश भर में जिला न्यायपालिका में न्यायिक अधिकारियों के पदों पर 50 प्रतिशत से अधिक महिलाओं की नियुक्ति से की। उन्होंने गैर कानूनी गतिविधियां निवारण कानून यानि यूएपीए के तहत हो रही गिरफ्तारियों पर भी चिंता व्यक्त की। आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि वर्ष 2019 से 2023 के बीच हजारों लोगों को इस कानून के तहत गिरफ्तार किया गया, लेकिन दोष सिद्ध होने की दर लगभग पांच प्रतिशत ही रही।
उन्होंने कहा कि इसका अर्थ यह है कि अधिकांश मामलों में या तो पर्याप्त साक्ष्य नहीं थे या फिर गिरफ्तारी जल्दबाजी में की गई। उन्होंने कहा कि यदि 95 प्रतिशत मामलों में आरोपी बरी हो रहे हैं, तो यह कानून के अधिक उपयोग या दुरुपयोग की ओर संकेत करता है। न्यायाधीश भुइयां ने यह भी कहा कि बिना आरोप पत्र दाखिल किए लंबे समय तक किसी व्यक्ति को जेल में रखना न्याय के मूल सिद्धांत के विपरीत है। उन्होंने जोर देकर कहा कि “जमानत नियम है और जेल अपवाद” का सिद्धांत कमजोर पड़ता जा रहा है, जिससे न्याय व्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि इससे अदालतों में लंबित मामलों की संख्या बढ़ती है और न्याय मिलने में देरी होती है। विकसित भारत की अवधारणा पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि देश में संसाधनों का समान वितरण होना चाहिए और आर्थिक असमानता समाप्त होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यह लक्ष्य हमारे संविधान के नीति निदेशक तत्वों में भी निर्धारित किया गया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायपालिका को अपनी स्वतंत्र भूमिका बनाए रखनी चाहिए। वह न तो स्थायी आलोचक बन सकती है और न ही किसी सरकारी अभियान की समर्थक।
उन्होंने राजनीतिक घोषणाओं पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि विकसित भारत का लक्ष्य एक राजनीतिक संकल्प है, जैसे अतीत में “गरीबी हटाओ” जैसे नारे दिए गए थे। न्यायपालिका को ऐसे नारों से अलग रहकर अपने दीर्घकालिक लक्ष्यों पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि न्यायपालिका के लिए वर्ष 2050 एक उपयुक्त लक्ष्य हो सकता है, जब संविधान और उच्चतम न्यायालय अपने सौ वर्ष पूरे करेंगे। यह समय आत्ममंथन और भविष्य की दिशा तय करने के लिए महत्वपूर्ण होगा। न्यायाधीश भुइयां ने सहिष्णुता के महत्व पर भी जोर दिया और वर्ष 1986 के एक ऐतिहासिक निर्णय का उल्लेख किया, जिसमें कुछ बच्चों को राष्ट्रगान गाने से छूट दी गई थी। उन्होंने कहा कि ऐसे फैसले केवल साहसी न्यायाधीश ही दे सकते हैं और यह हमारी परंपरा तथा संविधान की मूल भावना को दर्शाते हैं। समाज में सहिष्णुता केवल सिखाई ही नहीं जानी चाहिए, बल्कि उसका पालन भी होना चाहिए।
उन्होंने जाति आधारित भेदभाव और दलितों पर होने वाले अत्याचारों को विकसित भारत के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बताया। उन्होंने कहा कि समाज में अभी भी गहरी असमानताएं मौजूद हैं, जिन्हें समाप्त किए बिना विकास अधूरा रहेगा। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई परिवार दलित महिला द्वारा बनाए गए भोजन को स्वीकार नहीं करता या दलितों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता है, तो यह किसी भी विकसित समाज का संकेत नहीं हो सकता। अंत में उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति के सम्मान की रक्षा करना ही सच्चे विकास का आधार है। जब तक समाज में समानता, न्याय और सम्मान सुनिश्चित नहीं होगा, तब तक विकसित भारत का सपना अधूरा ही रहेगा।

