
सुशोभित
मेस्सी के साथ मेरी कहानी इस तस्वीर से शुरू हुई थी! मुझे फ़ुटबॉल से कुछ लेना-देना नहीं था और यों ही कौतूहलवश विश्वकप देख रहा था। अर्जेन्तीना 2014 का फ़ाइनल हार गया था। जर्मन जीत का जश्न मना रहे थे। पूरी दुनिया की नज़रें उन पर टिकी थीं। लेकिन मेरी आँखों में मेस्सी की वह छवि बस गई। मैंने देखा कि उस व्यक्ति के चेहरे में एक अजीब-सी मासूमियत थी। एक बहुत ही भले और नेक व्यक्ति होने का भाव था। पराजय के क्षण में उसमें शोक की अनन्य गरिमा थी, पीड़ा की अस्मिता थी, दु:ख की नियति को भोगने की पूरी तैयारी, पूरा स्वीकार था। मुखमण्डल पर उदासीनता, जब-तब एक कोमल-पारदर्शी स्मित। देखकर ऐसा लगा, जैसे टूटे पंखों वाला कोई देवता हो! खेल समाप्त होने के बाद मेस्सी ने अपने हिस्से की सारी रीतियाँ नियमपूर्वक निभाईं, मंच पर जाकर उपविजेता का रजत-पदक और टूर्नामेंट के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी को दी जाने वाली गोल्डन-बॉल ली और चुपचाप अंधकार की खोह में चले गये- विनम्र, शोकात्मक, लेकिन गरिमावान।
यह वो खिलाड़ी था, जिसके सिर पर किशोरावस्था में ही अपेक्षाओं का बोझ लाद दिया गया था। जिसे स्वयं डिएगो माराडोना ने अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। और इसीलिए जिससे रोज़ पूछा जाता था कि तुम अर्जेन्तीना के लिए कोई ट्रॉफ़ी कब जीतोगे। वो विश्व कप फ़ाइनल तक गये और हारे। वो जानते थे कि इतिहास इसके लिए उन्हें कभी माफ़ नहीं करेगा। लेकिन उन्होंने इस त्रासदी को सहन करने की पूरी तैयारी कर ली थी।
कौन है यह मेस्सी- मैंने स्वयं से पूछा। बेशक़, विश्व-प्रसिद्ध खिलाड़ी के नाम से तो मैं परिचित था, लेकिन उतना ही जितना कि कोई अनायास-दर्शक होता है। लेकिन उस शाम के बाद, मैं फिर मेस्सी को भुला नहीं पाया। मेरी आँख उन पर जम गई। मैं फ़ुटबॉल में रम गया- केवल इस एक खिलाड़ी के कारण। मुझे मालूम हुआ कि मेस्सी एफ़सी-बार्सीलोना नामक एक क्लब में स्पैनिश लीग खेलते हैं। मैंने वह लीग देखनी शुरू कर दी- फ़ुटबॉल के लिए नहीं, मेस्सी के लिए- अलबत्ता बाद में मुझे समझ आया कि मेस्सी को देखना और फ़ुटबॉल देखना, मेस्सी को प्रेम करना और फ़ुटबॉल के सम्मोहन में डूब जाना- एक ही बात है।
मैंने पाया कि इस खिलाड़ी की प्रतिभा साधारण नहीं थी। वह भौतिकी के नियमों को झुठला देता था। उसके खेल में एक अजीब किस्म की प्रशांति, ठहराव, लगभग संगीत सरीखी तन्मयता थी। मेस्सी का खेल देखते-देखते मैं फ़ुटबॉल की बारीकियाँ समझने लगा। 2014 के उस स्वप्नभंग के बाद, अगले ही वर्ष मैंने मेस्सी को 2015 में बार्सीलोना के लिए चैम्पियंस लीग जीतते हुए देखा और उनकी बालसुलभ प्रसन्नता के साथ ख़ुद भी प्रमुदित हुआ। लेकिन मैं जानता था कि जिस व्यक्ति के साथ मेरी कहानी पराजय के एक क्षण से शुरू हुई है, वह जीत से और प्रगाढ़ नहीं होने वाली है।
मैंने मेस्सी को बहुत हारते हुआ देखा है, लेकिन हर हार के साथ मेरा सम्बंध उनसे गहराता गया। क्योंकि मैं उनका खेल देखता था और जानता था कि वह सर्वश्रेष्ठ हैं। जीत-हार केवल एक परिप्रेक्ष्य है। 2016 का कोपा अमरीका फ़ाइनल हारने के बाद तो मेस्सी पूरी दुनिया के सामने ही फूट-फूटकर रो पड़े थे। उन्होंने राष्ट्रीय टीम के लिए यह खेल त्यागने का भी मन बना लिया था। मेरे सांत्वना के शब्द मेस्सी तक तो पहुँच नहीं सकते थे, किन्तु मैंने लिखकर मेस्सी को सांत्वना दी : “मेस्सी नायक हैं क्योंकि वो हार गये। हर नायक की नियति में पराजय के महान क्षण होते हैं। वो ही विजय की पूर्वपीठिका रचते हैं। किन्तु विजय से मिलने वाले यश से उस खिलाड़ी की प्रतिभा अपना परिप्रेक्ष्य नहीं गँवाती। मेस्सी के खेल का सत्त्व जीत-हार की सांसारिक-सूचनाओं से परे है।”
2014 की उस शाम के बाद मैंने मेस्सी का लगभग हर मैच देखा, जब तक कि वो मियामी नहीं चले गए। मेस्सी के लिए ही मैंने स्पैनिश और फ्रांसीसी लीग फ़ॉलो की, दक्षिण अमेरिका के अलस्सुबह तक चलने वाले फ्रेंडली, क्वालिफ़ाइंग और प्रतिस्पर्धात्मक मुक़ाबले तक देखे, चैम्पियंस लीग की यूरोपियन रातों में मेस्सी के साथ मैं जीता, हारा, रोया, ख़ुश हुआ। लेकिन उनसे अलग नहीं हुआ। 2019 में जब मेस्सी ने लिवरपूल के हाथों हारकर भी सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का बैलोन डी’ओर पुरस्कार जीता तो इस निर्णय में निहित न्यायप्रियता ने मुझे बल दिया। मैं आश्वस्त हुआ कि संसार में कलुष का साम्राज्य अभी इतना व्याप्त नहीं हो गया है कि वो केवल जीत और उसके आँकड़ों को देखता हो, श्रेष्ठ, नैतिक सौन्दर्य को निरखने वाली आँखें अब भी सजल हैं।
2014 का विश्वकप हारने के बाद मेस्सी ने 2022 का विश्वकप जीता और अब वे फिर 2026 के विश्वकप का फ़ाइनल खेलने जा रहे हैं। तीन विश्वकप फ़ाइनल खेलने वाले वे दुनिया के इकलौते फ़ुटबॉलर बन जाने वाले हैं। उनका तीसरा गोल्डन-बॉल भी लगभग पक्का है और शायद इस बार वो सर्वाधिक गोल करने वाले खिलाड़ी को दिया जाने वाला गोल्डन-बूट भी जीतें। मेस्सी पहले ही फ़ुटबॉल-इतिहास के सबसे ‘डेकोरेटेड’ खिलाड़ी बन चुके हैं और उन्होंने कुल 48 ट्रॉफियाँ जीती हैं। 49वीं का खिताबी मुक़ाबला वे खेलने जा रहे हैं। फ़ुटबॉल के अनेक कीर्तिमानों की सूची में वे शिखर पर हैं। लेकिन मेस्सी को प्यार करने वाले उनके इन कीर्तिमानों के लिए नहीं, उनके सौम्य, प्रेमल और अपनी ख्याति से लगभग अनभिज्ञ व्यक्तित्व के लिए प्रेम करते हैं। हम मेस्सी को जीतते हुए देखना तो चाहते हैं, लेकिन उनकी हार से हम विस्थापित नहीं होते। इस प्यार की शुरुआत हार से ही जो हुई थी!
मेस्सी अब एक खिलाड़ी से बढ़कर एक वैश्विक-भावना बन चुके हैं। जीवन से हारे-टूटे करोड़ों लोग आज मेस्सी को देखकर जी रहे हैं। अफ्रीका, लातीन अमरीका, दक्षिण-पूर्व और मध्येशिया, कातालोनिया से केरल, कलकत्ता और चटगाँव तक की गलियों में मेस्सी की जीत का उत्सव मनाया जाता है, हार पर आँसू बहाए जाते हैं। इस व्यक्ति में कुछ ऐसा अनिर्वचनीय तत्त्व है, जो दर्शकों को बाँध लेता है। वह सबसे बड़ा खिलाड़ी तो है, लेकिन एक खिलाड़ी से बढ़कर भी है। 2014 की उस रात मेस्सी की जिस छवि पर मैं मुग्ध हो गया था, उसके प्रति लगाव की सन्निधि देखो तो मुझे कितनी दूर तक ले आई है!
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

