झारखंड के असुर क्यों मानते हैं महिषासुर को अपना वंशज

महिषासुर को लेकर आदिवासी समुदायों की मान्यताएं मुख्यधारा की पौराणिक कथा से अलग हैं। जानिए हुदुर दुर्गा की परंपरा, लोकगीत, पूर्वजों की स्मृति और सांस्कृतिक पहचान का महत्व।

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लक्ष्मीनारायण मुंडा

भारत की सांस्कृतिक परंपराएँ एक नही,अनेक हैं। मुख्यधारा की पौराणिक कथाओं में महिषासुर को देवी दुर्गा द्वारा वध किये गये असुर के रूप में चित्रित किया जाता है और दुर्गा पूजा-दशहरा विजय का उत्सव माना जाता है। परन्तु झारखंड, पश्चिम बंगाल,मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के कुछ आदिवासी समुदायों विशेषकर असुर और संथाल की मौखिक परंपरा में महिषासुर एक अलग व्यक्तित्व के रुप में जीवित हैं। वे उन्हें ‘हुदुर दुर्गा’ या ‘हुड़ुर दुर्गा’ कहते हैं। जहाँ ‘हुदुर’ बिजली या गर्जना का संकेत और ‘दुर्गा’ रक्षक या दुर्ग के स्वामी का है। उनके अनुसार महिषासुर एक शक्तिशाली,न्यायप्रिय और स्त्रियों का सम्मान करने वाले मूलनिवासी राजा (जननायक) थे।

आदिवासी कथा का सार

इस परिप्रेक्ष्य के अनुसार पुराणों में वर्णित देव-असुर संग्राम आदिवासी समुदाय आर्य और अनार्य (मूल निवासी) समुदायों के बीच सांस्कृतिक-राजनीतिक संघर्ष का प्रतीकात्मक वर्णन हैं। महिषासुर को सीधे युद्ध में हराना असंभव था। आदिवासी समुदाय की मान्यता है कि उनके राज्य में स्त्रियों का विशेष सम्मान था और वे किसी महिला पर हथियार नही उठाते थे। इसी गुण का लाभ उठाकर एक सुंदर स्त्री रुप में दुर्गा को भेजा गया। मित्रता या विवाह के प्रस्ताव के बहाने महल में प्रवेश कर अवसर पाकर नौवें दिन उनका वध कर दिया गया। यह कथा छल और कूटनीति की कहानी के रुप में सुनाई जाती है।

असुर जनजाति (झारखंड के गुमला, लोहरदगा,पलामू,लातेहार आदि क्षेत्रों में) स्वयं को महिषासुर के वंशज मानते हैं। नवरात्रि से दशहरा तक कई परिवार शोक या स्मरण का समय मानते हैं। कुछ परंपराओं में घरों के दरवाजे-खिड़कियाँ बंद रखकर या शुभ कार्य नही किया जाता है। पश्चिम बंगाल के कुछ क्षेत्रों में ‘हुदुड़ दुर्गा’ की मूर्ति स्थापित कर पूजा या स्मरण भी होता है। संथाल समुदाय के कुछ हिस्से गोड्डा आदि जगहों पर प्रतीकात्मक रुप से महिषासुर की खोज करते हुए पंडालों में जाते हैं और अपने राजा की याद में गीत गाते हैं। मिट्टी की प्रतिमा या पिंड बनाकर पूर्वजों को याद करने की परंपरा भी बताई जाती है। ये प्रथाएँ मुख्यतः मौखिक हैं। युवा पीढ़ी और संगठन इन्हें सांस्कृतिक पहचान के रूप में मजबूत करने का प्रयास कर रहे हैं। ‘महिषासुर शहादत दिवस’ या ‘स्मरण दिवस’ के आयोजन हाल के दशकों में अधिक संगठित हुए हैं,जहाँ लोकगीत,चर्चा और पूर्वजों की वीरता याद की जाती है।

विभिन्न क्षेत्रों में लोक-स्मृति में चर्चा है

महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा के ग्रामीण इलाकों में म्हास्कोबा (या म्हसोबा,महिषबा) नामक लोक-देवता की पूजा किसान और चरवाहे समुदाय करते हैं। यह भैंस से जुड़ा क्शेत्रपाल (क्षेत्र रक्षक) देवता है। फसल बुवाई,बारिश और सुरक्षा के लिए गाँव के बुजुर्ग ही पूजा कराते हैं-वैदिक ब्राह्मण पुजारी की आवश्यकता नही होती है। कुछ विद्वान इसे प्राचीन भैंस-देवता परंपरा से जोड़ते हैं,जो पौराणिक महिषासुर कथा से जुड़ा हो सकता है,लेकिन लोक-प्रथा में यह रक्षक और शुभ शक्ति के रुप में पूजा जाता है। कर्नाटक के मैसूर (Mysuru) का नाम पारंपरिक रुप से महिषा-ऊरु या महिषासुर से जोड़ा जाता है-अर्थात् महिष का देश/शहर। चामुंडी पहाड़ियों पर महिषासुर की विशाल प्रतिमा है। मुख्यधारा की कथा में देवी चामुंडेश्वरी द्वारा उनका वध बताया जाता है, पर स्थानीय स्तर पर कई लोग उन्हें ऐतिहासिक शासक या क्षेत्र से जुड़े व्यक्तित्व के रूप में भी याद करते हैं।

विविध दृष्टिकोण और संतुलन

यह आदिवासी कथा मुख्यधारा की पौराणिक व्याख्या से भिन्न है। पुराण प्रतीकात्मक हैं-असुर-देव द्वंद्व अक्सर नैतिक,दार्शनिक या सामाजिक संघर्षों का रुपक होता है, न कि किसी तरह का सीधा ऐतिहासिक दस्तावेज है । आधुनिक ऐतिहासिक शोध आर्य-अनार्य संघर्ष को जटिल प्रवास,सांस्कृतिक मिश्रण और भाषाई बदलावों के रुप में देखता है, न कि एकतरफा आक्रमण-युद्ध के रुप में देखता है। कुछ जनजातीय विद्वान और शोधकर्ता यह भी कहते हैं कि महिषासुर पूजा या शहादत दिवस सभी आदिवासी समुदायों की प्राचीन सार्वभौमिक परंपरा नही है, कई जगह यह हाल की पहचान-आधारित पुनरुत्थान या राजनीतिक-सांस्कृतिक आंदोलन का हिस्सा है। फिर भी असुर और कुछ संथाल समुदायों की जीवित मौखिक परंपरा, लोकगीत और स्मरण-अनुष्ठान वास्तविक हैं। वे अपनी इतिहास-दृष्टि को मुख्यधारा की कथा के समकक्ष रखने का अधिकार रखते हैं। हर समुदाय की अपनी स्मृति और नायक होते हैं। महिषासुर को ‘राक्षस’ कहकर एकतरफा चित्रित करना उतना ही अधूरा है जितना उन्हें बिना आलोचना के पूर्ण ऐतिहासिक राजा घोषित करना है।

आगे का रास्ता और गौरव-संवाद

आदिवासी समुदायों के लिए यह कथा केवल पौराणिक विवाद नही, बल्कि सांस्कृतिक आत्मसम्मान, पूर्वजों की याद और अपनी दृष्टि से इतिहास लिखने का प्रयास है। मिट्टी की प्रतिमा,लोकगीत और स्मरण दिवस इसी गौरव की अभिव्यक्ति हैं। इसके साथ ही भारत की बहुलता इसी में निहित है कि दुर्गा पूजा और महिषासुर स्मरण दोनों समानांतर चल सकते हैं—एक-दूसरे को बिना नकारे होना चाहिए। सच्चाई एक नही,कई स्तरों पर है। पौराणिक कथाएँ विश्वास और अर्थ की दुनिया हैं। ऐतिहासिक व्याख्याएँ साक्ष्य और बहस की भी है। आदिवासी समुदाय अपनी मौखिक विरासत को सुरक्षित रखें,उससे शोध और दस्तावेजीकरण से जोड़ें और मुख्यधारा के साथ संवाद करें।

हमें पूर्वजों का गौरव याद रखना होगा

यह भी स्वाभाविक है-बशर्ते वह घृणा या विभाजन का साधन न बन पाए,बल्कि सांस्कृतिक विविधता की स्वीकृति का है। महिषासुर की यह आदिवासी दृष्टि हमें याद दिलाती है कि भारत की कहानी सिर्फ एक किताब की नही, हजारों आवाजों की है। उन आवाजों को सुनना और समझना ही सच्ची सांस्कृतिक समृद्धि है।

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विनीता चौबे को 10 साल का अनुभव है। उन्होनें सन्मार्ग से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर न्यूज विंग, बाइस स्कोप, द न्यूज पोस्ट में भी काम किया। वे राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं से जुड़ी खबरों को सरल और तथ्यात्मक भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका प्रयास रहता है कि जमीनी स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को सही और विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों तक पहुंचाया जाए।