
रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने एक लापता बच्ची से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन पर अहम मौखिक टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि झारखंड में राजस्थान समेत अन्य राज्यों से आने वाले घुमंतू लोगों के लिए अब तक कोई स्पष्ट नियम या गाइडलाइन तय नहीं की गई है।
कोर्ट का कहना है कि पुलिस अक्सर ऐसे लोगों की पहचान या आधार कार्ड की जांच नहीं करती और न ही राज्य सरकार ने इनके ठहरने और निगरानी को लेकर कोई ठोस व्यवस्था बनाई है। ये लोग अलग-अलग जगहों पर टेंट लगाकर रहते हैं और कई बार आपराधिक गतिविधियों में भी शामिल पाए जाते हैं। ऐसे में इन पर नजर रखने के लिए पुलिस प्रशासन को स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाने की जरूरत है।
गृह सचिव को ऑनलाइन पेश होने का निर्देश
हाईकोर्ट ने इस मामले में राज्य के गृह सचिव को अगली सुनवाई की तारीख 27 जनवरी को ऑनलाइन उपस्थित होने का आदेश दिया है। अदालत ने साफ कहा कि बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में सरकार को गंभीरता दिखानी होगी।
धुर्वा से लापता बच्चों का भी जिक्र
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने हाल ही में रांची के धुर्वा इलाके से लापता हुए दो बच्चों, अंश और अंशिका, का भी उल्लेख किया। अदालत ने चिंता जताते हुए कहा कि झारखंड में बच्चों की तस्करी का नेटवर्क सक्रिय है और इस पर कड़ी निगरानी जरूरी है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि ऐसे मामलों में जिम्मेदार लोगों को जल्द से जल्द गिरफ्तार किया जाए।
2018 से चल रहा है मामला
यह मामला गुमला जिले की छह वर्षीय बच्ची से जुड़ा है। बच्ची की मां चंद्रमुनि उराइन ने सितंबर 2018 में हाईकोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दायर की थी। इस केस की सुनवाई न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति ए.के. राय की खंडपीठ कर रही है।
नई एसआईटी का गठन
कोर्ट के पुराने आदेश के तहत गुमला के एसपी सुनवाई में पेश हुए। उन्होंने बताया कि मामले की जांच के लिए नई विशेष जांच टीम (एसआईटी) बनाई गई है। टीम दिल्ली भी गई और बच्ची की तलाश में उसकी तस्वीरें कई जगह अपलोड करवाई गईं। हालांकि अब तक बच्ची नहीं मिली है और खोज जारी है।
कोर्ट ने गुमला एसपी को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने से छूट दे दी है। राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता सचिन कुमार ने पक्ष रखा। गौरतलब है कि इसी मामले में वर्ष 2023 में गठित एसआईटी ने छापेमारी के दौरान नौ लापता बच्चों को सुरक्षित बरामद किया था।
