नई दिल्ली : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत के एक बयान ने एक बार फिर संघ में महिलाओं की भूमिका और सदस्यता को लेकर बहस छेड़ दी है। इंडिया इंटरनेशनल मॉडल यूनाइटेड नेशंस (IIMUN) की 15वीं वर्षगांठ के कार्यक्रम में उनसे पूछा गया कि जब संघ महिलाओं की राष्ट्र निर्माण में बराबर की भागीदारी की बात करता है, तो उसकी मूल सदस्यता अब भी केवल पुरुषों तक ही क्यों सीमित है। इस सवाल के जवाब में भागवत ने संघ की मौजूदा व्यवस्था के पीछे के कारणों और महिलाओं की भूमिका पर विस्तार से अपनी बात रखी।

महिलाओं की भूमिका पर क्या बोले भागवत ?
भागवत ने कहा कि महिलाओं को पुरुषों के समान अवसर, प्रशिक्षण और क्षमता विकसित करने का पूरा अधिकार है। उनके अनुसार महिलाएं समाज और राष्ट्र निर्माण में पुरुषों की बराबर की भागीदार हैं और दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। उन्होंने कहा कि महिलाओं को हर वह प्रशिक्षण और अवसर मिलना चाहिए, जो पुरुषों को उपलब्ध हैं।महिलाओं को आरएसएस की औपचारिक सदस्यता से बाहर रखने के सवाल पर भागवत ने संगठन के इतिहास का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि जब 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई थी, तब सामाजिक परिस्थितियां अलग थीं। उस समय पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग संगठन बनाना सामान्य व्यवस्था मानी जाती थी। यदि उस दौर में दोनों को एक ही संगठन में शामिल करने का प्रयास किया जाता, तो संभव है कि संघ का विस्तार उसी तरह नहीं हो पाता।
भागवत के अनुसार, मौजूदा व्यवस्था किसी भेदभाव की भावना से नहीं, बल्कि उस समय की सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप बनी। महिलाओं के लिए कार्य करने वाला राष्ट्र सेविका समिति संगठन अक्सर आरएसएस की महिला शाखा समझा जाता है, लेकिन भागवत ने इसे सही नहीं माना। उन्होंने कहा कि राष्ट्र सेविका समिति एक स्वायत्त (Autonomous) संगठन है। उसके उद्देश्य व्यापक रूप से संघ की विचारधारा से जुड़े हैं, लेकिन उसका संचालन स्वतंत्र रूप से होता है। दोनों संगठन एक-दूसरे का सहयोग करते हैं, लेकिन एक-दूसरे के अधीन नहीं हैं।
क्या भविष्य में व्यवस्था बदल सकती है?
भागवत ने इस संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि यदि भविष्य में राष्ट्र सेविका समिति स्वयं यह महसूस करे कि महिलाओं के लिए अलग संगठन की आवश्यकता नहीं रह गई है, तो आरएसएस महिलाओं के बीच सीधे काम करने पर विचार कर सकता है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि फिलहाल दोनों संगठनों की अलग-अलग व्यवस्था जारी रहेगी।
क्या निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी है?
कार्यक्रम के दौरान यह सवाल भी उठा कि क्या महिलाओं की संघ के शीर्ष स्तर के निर्णयों में कोई भूमिका होती है। इस पर भागवत ने दावा किया कि विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत महिलाएं संघ की सर्वोच्च प्रतिनिधि संस्था अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठकों में शामिल होती हैं और निर्णय प्रक्रिया के दौरान उनकी मौजूदगी रहती है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह भागीदारी आरएसएस की औपचारिक सदस्यता से अलग व्यवस्था के तहत होती है।
संघ और राष्ट्र सेविका समिति का रिश्ता
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना वर्ष 1925 में हुई थी। इसके कुछ वर्ष बाद 1936 में महिलाओं के लिए राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना की गई। दोनों संगठन अलग-अलग संरचना में कार्य करते हैं। संघ का कहना है कि दोनों के उद्देश्य समान हैं, लेकिन दोनों स्वतंत्र रूप से संचालित होते हैं।
यह बयान क्यों महत्वपूर्ण है?
आरएसएस लंबे समय से महिलाओं को राष्ट्र निर्माण में पुरुषों के समान भागीदार बताता रहा है। दूसरी ओर, उसकी औपचारिक सदस्यता अब भी केवल पुरुषों तक सीमित है। यही कारण है कि समय-समय पर यह सवाल उठता रहा है कि क्या भविष्य में संघ अपनी सदस्यता व्यवस्था में बदलाव करेगा। मोहन भागवत के ताजा बयान से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि फिलहाल आरएसएस अपनी मौजूदा संगठनात्मक व्यवस्था में बदलाव के पक्ष में नहीं है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यदि भविष्य में परिस्थितियां बदलती हैं और राष्ट्र सेविका समिति ऐसा उचित समझती है, तो व्यवस्था पर नए सिरे से विचार किया जा सकता है।


