नेपाल बाढ़: भीड़-भाड़ वाले राहत शिविरों में बच्चों की देखभाल करने में माताओं को हो रही दिक्कत

नेपाल की बाढ़ से विस्थापित माताओं और शिशुओं पर दोहरी मार, राहत शिविरों में भोजन, स्तनपान, निजता और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी ने बढ़ाई महिलाओं की मुश्किलें और चिंताएं।

Razi Ahmad
8 Min Read
WhatsApp Group Join Now
Instagram Follow Now

काठमांडू: नेपाल में आई बाढ़ ने शर्मिला श्रेष्ठा का घर उजाड़ दिया और उन्हें कई दिनों तक अपनी छोटी बच्ची से अलग कर दिया। अब, उन्हें अपनी बेटी एक भीड़भाड़ वाले राहत शिविर में मिल गई है, लेकिन बच्ची को शिशु आहार के बजाय वयस्कों का भोजन करते देख वह खुद को असहाय महसूस कर रही हैं।

चौदह माह की यह बच्ची काठमांडू के उत्तर-पश्चिम हिस्से में एक कक्षा के फर्श पर अपनी मां के साथ सोती है। उसी जगह श्रेष्ठा की एक करीबी रिश्तेदार का 18 महीने का बेटा भी है। दोनों बच्चों के लिए कोई शिशु आहार उपलब्ध नहीं है।

रविवार को ‘काठमांडू पोस्ट’ के हवाले से 33 वर्षीय शर्मिला ने कहा, ‘‘बच्चों के लिए कोई अलग खाना नहीं दिया जा रहा है। हमें मजबूरी में छोटे बच्चों को भी वही खाना खिलाना पड़ रहा है, जो वयस्क लोगों को दिया जाता है।’’

बाढ़ में बिछड़ने के बाद अपनी बेटी को खोजने के लिए श्रेष्ठा ने पहाड़ी रास्तों पर छह घंटे पैदल यात्रा की थी। दो-तीन दिन तक उन्हें अपनी बच्ची नहीं मिली थी।

श्रेष्ठा जैसी कई माताओं के लिए 26 अगस्त को नेपाल में आई अचानक बाढ़ ने एक संकट के भीतर दूसरा संकट पैदा कर दिया है। यह संकट सिर्फ बाढ़ के बढ़ते पानी तक सीमित नहीं है, बल्कि अब भीड़भाड़ वाले राहत शिविरों, बच्चों को खाना खिलाने के समय, कक्षाओं के फर्श और अस्पतालों तक पहुंचने वाले खतरनाक रास्तों पर दिखाई दे रहा है। शिशु भूखे हैं। माताएं स्तनपान कराने में परेशानी झेल रही हैं। गर्भवती महिलाएं इस चिंता में हैं कि जरूरत पड़ने पर वे अस्पताल तक पहुंच पाएंगी या नहीं।

सैकड़ों लोगों से खचाखच भरे राहत शिविरों में मां बनने की सबसे बुनियादी जरूरत — बच्चे को स्तनपान कराने और उसे संभालने के लिए शांत और निजी जगह — भी एक बड़ी सुविधा जैसी लग रही है।

त्रिशूली इलाके में रहने वाली परियार तीन महीने पहले मां बनी थीं। 26 अगस्त को जब बाढ़ का पानी तेजी से बढ़ा तो उन्हें अपना घर छोड़कर भागना पड़ा।

अब वह भोटेकोशी-त्रिशूली गलियारे के एक राहत शिविर में अपने बच्चे को स्तनपान कराती हैं, जहां कई अनजान लोग रहते हैं। आसपास पुरुष धूम्रपान करते हैं और शराब की गंध भी आती रहती है।

परियार ने कहा, ‘‘हम सभी एक ही जगह रह रहे हैं, इसलिए बहुत मुश्किल होती है। सिगरेट का धुआं है, शराब की गंध है और बच्चा सो नहीं पाता।’’
बाढ़ के बाद, उन्होंने बच्चे को डिब्बाबंद दूध देने की कोशिश की, लेकिन उससे बच्चे का पेट खराब होता दिखा तथा दूध पीने के बाद वह और ज्यादा रोने लगा।

परियार ने कहा, ‘‘अगर यहां कोई सुरक्षित जगह होती और बच्चे को टीके भी लग जाते तो बेहतर होता। हमें समय पर खाना भी नहीं मिल रहा है। हमें पर्याप्त भोजन नहीं मिल रहा।’’

उनकी मांग बहुत छोटी है — ‘‘एक अलग जगह।’’ ऐसी जगह, जहां स्तनपान कराने वाली माताओं को सिर्फ भीड़ का हिस्सा न समझा जाए।

बाढ़ प्रभावित रसुवा, नुवाकोट और धादिंग जिलों में हजारों महिलाएं इसी तरह की परेशानियों का सामना कर रही हैं।

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) के अनुसार, इन तीन जिलों की 15 नगरपालिकाओं में करीब 4,430 गर्भवती महिलाएं रह रही हैं। यह आंकड़ा प्रभावित करीब 3.10 लाख लोगों के आधार पर मानवीय सहायता योजना के लिए लगाया गया अनुमान है, न कि अलग-अलग महिलाओं की पहचान कर तैयार की गई संख्या।

इस अनुमान के अनुसार, अगले एक महीने में करीब 492 बच्चों के जन्म की संभावना है और लगभग 74 महिलाओं को आपात प्रसूति देखभाल की जरूरत पड़ सकती है।

लेकिन कई महिलाओं के लिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बच्चे का जन्म कब होगा, बल्कि यह भी है कि जरूरत पड़ने पर उन्हें मदद मिल पाएगी या नहीं।

इलाके के जिला अस्पताल त्रिशूली अस्पताल में बाढ़ के बाद से नौ प्रसव हो चुके हैं। वहीं, गर्भवती महिलाएं चिकित्सकों को बुखार, गर्भ में बच्चे की हलचल कम होने और मूत्र संक्रमण जैसी समस्याएं पेश आने से अवगत करा रही हैं।

अस्पताल के प्रसूति विभाग की प्रमुख बसंती पांचा ने कहा, ‘‘बाढ़ के कारण स्वास्थ्य सेवाओं का संचालन बहुत मुश्किल हो गया है।’’

बिजली की आपूर्ति भरोसेमंद नहीं है, जिसके कारण ऑपरेशन के लिए जनरेटर चलाना पड़ता है और उपकरणों को छोटे-छोटे हिस्सों में हाथ से साफ करना पड़ रहा है।

पांचा ने कहा, ‘‘पहले काठमांडू सड़क मार्ग से केवल दो घंटे की दूरी पर था। अब भूस्खलन के कारण सड़क मार्ग से वहां पहुंचने में कितना समय लगेगा, कोई नहीं जानता।’’

अस्पताल में ऐसे नवजात शिशुओं के लिए अत्याधुनिक सुविधा भी नहीं है, जिन्हें अचानक गहन चिकित्सा की जरूरत पड़ सकती है।

पांचा ने कहा, ‘‘गर्भावस्था अपने आप में चिंता, तनाव और भविष्य को लेकर आशंकाएं पैदा करती है। लेकिन बाढ़ ने इन महिलाओं की परेशानियों को और बढ़ा दिया है।’’

मध्य नेपाल के चंद्रावती माध्यमिक विद्यालय में बने राहत केंद्र में 1,000 से अधिक विस्थापित लोग रह रहे हैं, जिनमें 500 से ज्यादा महिलाएं हैं।

महिला अधिकार संगठन डब्ल्यूओआरईसी की कार्यकारी निदेशक रेखा श्रेष्ठा ने कहा, ‘‘हर कोई एक ही जगह रह रहा है।’’

उन्होंने बताया कि मासिक धर्म वाली किशोरियों के लिए पर्याप्त सैनिटरी पैड उपलब्ध नहीं हैं। एक बार वितरण के दौरान महिलाओं को केवल एक पैड दिया गया और कहा गया कि इसे तीन-चार दिन तक चलाना है।

रेखा ने कहा, ‘‘गर्भवती महिलाओं और प्रसव के बाद की माताओं की जरूरतें अलग होती हैं। नहाने, कपड़े सुखाने और स्तनपान कराने के लिए कोई निजी जगह नहीं है। आपदा के समय ऐसी निजता कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि जरूरी जरूरत है।’’

उनके संगठन ने अब महिलाओं के लिए अनुकूल स्थान बनाने की शुरुआत की है।

राहत कार्यों से जुड़े लोगों के अनुसार, विस्थापित महिलाओं को ऐसी राहत व्यवस्था में शामिल कर दिया गया है, जहां सभी लोगों की जरूरतों को एक जैसा मान लिया जाता है। इसमें स्तनपान कराने वाली माताओं, प्रसव के बाद की महिलाओं की निजता और शिशुओं की जरूरतों का अक्सर ध्यान नहीं रखा जाता।

परियार ने कहा, ‘‘हमारे लिए यह बहुत मुश्किल समय है।’’

Share This Article
रजी अहमद एक उभरते हुए कंटेंट राइटर हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग दो वर्षों का अनुभव है। उन्होंने न्यूज़ अरोमा में काम करते हुए विभिन्न विषयों पर लेखन किया और अपनी लेखन शैली को मजबूत बनाया। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कंटेंट राइटिंग, न्यूज़ लेखन और मीडिया से जुड़े विभिन्न पहलुओं में अच्छा अनुभव हासिल किया। वह लगातार सीखते हुए अपने करियर को आगे बढ़ा रहे हैं।