
कई लोग नार्थ ईस्ट के लोगों का चेहरा देखकर जलील भरे शब्दों से उन्हें चीनी या नेपाली सरजमीं का घोषित कर देते हैं और ऐसे लोगों की सोच मूर्खो से भी गई गुजरी होती हैं। जब देश में बाहरी आक्रमण का सामना हुआ है नार्थ ईस्ट के लोगों ने हमेशा सेना की मदद कंधे से कंधे मिलाकर की हैं बल्कि सेना और देश के लिए जमीनी स्तर पर लड़े भी है।वूलंग वॉर मेमोरियल इसी वीरता और बहादुरी का समावेश हैं। यह वॉर मेमोरियल 1962 के भारत चीन युद्ध की वीरगाथा का जीता जागता है। अरुणाचल प्रदेश के अंजाव जिले में लोहित नदी के किनारे बसे वोलांग में 21 अक्टूबर से 16 नवंबर 1962 तक भारतीय सेना की करीब 2,191 जवानों वाली 11वीं इन्फैंट्री ब्रिगेड ने संख्या और हथियारों में कई गुना मजबूत करीब 10,000 चीनी सैनिकों का डटकर मुकाबला किया। इस युद्ध में भारत के 364 जवान शहीद हुए, 278 घायल हुए और 345 युद्धबंदी बने, जबकि भारतीय सेना ने चीनी सैनिकों को भी भारी नुकसान पहुंचाया।
स्थानीय मिश्मी, मेयोर और अन्य जनजातियों ने राशन और गोला बारूद ढोने, रास्ते दिखाने, जवानों को खुफिया जानकारी देने तथा घायल सैनिकों को भोजन और शरण देकर इस लड़ाई में अमूल्य योगदान दिया। तो आगे से अपने अल्पज्ञान की वजह से किसी को चाइनीज बोलने से पहले एक बार उन्हें इतना भर पूछ लीजिये कि आप कहाँ से है? कभी नार्थ ईस्ट आकर लोगों के साथ आकर बैठना और लोगों को समझने की कोशिश कीजिये आप जान जाएंगे कि यहां के लोगों में भी प्रेम, मेहमानवाजी और देशभक्ति बसती हैं। हाँ कल्चर की वजह से खान पान में बदलाव नज़र आएगा पर यहां से जाएंगे तो यहां की यादों और कहानियों का पिटारा साथ लेकर जाएंगे।

