नॉर्वे की प्राथमिक शिक्षा और गांधी

प्रवीण झा का लेख: नॉर्वे की प्राथमिक शिक्षा प्रणाली और महात्मा गांधी के शैक्षिक दर्शन में अनोखी समानताएं।

Razi Ahmad
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  • प्रवीण झा

Bihar Education: “हमें स्कूल में गांधी फिल्म दिखायी गयी थी। उस समय वह बहुत लंबी और नीरस लगी थी। लेकिन गांधी से परिचय तो तभी हो गया था। वह छवि अब तक दिमाग में मौजूद है।”,

एक नॉर्वेजियन मित्र ने बताया मैं जब नॉर्वे के (या यूँ कहें दुनिया के) सबसे उत्तरी छोर पर गया, तो वहाँ त्रोम्सो विश्वविद्यालय है। उसमें टहलते हुए बर्फीले अहाते के बीच में एक काली प्रतिमा दिखी जिस पर एक गोल गुलदस्ता रखा था। ऐसे गुलदस्ते यूरोपीय कब्रगाहों में दिखते हैं, जो अपने मृत पूर्वजों के लिए रखते हैं। पास जाकर देखा तो वह गांधी की प्रतिमा थी। गुलदस्ता इतना ताजा था, जैसे कोई अभी-अभी रख कर गया हो। मैंने गांधी की प्रतिमा दुनिया के बड़े शहरों में देखी है, मगर उत्तरी नॉर्वे की वह छवि अब तक धुंधली नहीं हुई।

लेकिन नॉर्वे के प्राथमिक विद्यालय को गांधी किस तरह देखते? क्या वे उनके मापदंडों पर खरे उतरते? भारत में तो स्वाभाविक है, मगर यूरोपीय देशों के लिए तो गांधी मॉडल का मतलब ही नहीं।

नॉर्वे के प्राथमिक विद्यालयों में काष्ठकारी (लकड़ी का काम/बढ़इगिरी) पहली कक्षा से धीरे-धीरे सिखाना शुरू करते हैं। छठी कक्षा तक वह मेज-कुर्सियाँ आदि बना लेते हैं। मुझे हाल में पता लगा कि सीढ़ी बनाने के लिए एक गणितीय फार्मूला है, और यह एक बच्चे ने बताया। ऐसी शिक्षा शायद इसलिए भी दी जाती हो, क्योंकि नॉर्वे में अधिकांश घर लकड़ी के होते हैं। और बढ़ई हर जगह आसानी से मिलते नहीं।

गांधी ने दक्षिण अफ्रीका के तोलस्तॉय फार्म में प्राथमिक शिक्षा शुरू की थी। वहाँ भी बच्चों को काष्ठकारी और चप्पल बनाना सिखाया जाता था। बल्कि स्कूल की मेज और कुर्सियाँ शिक्षकों और छात्रों ने मिल कर बनायी थी।

नॉर्वे के प्राथमिक विद्यालय में चौथी कक्षा से भोजन बनाने की मामूली शिक्षा शुरू होती है। जैसे सब्जी काटना। साधारण नाश्ता बनाना। छठी कक्षा में गरम भोजन पकाना सिखाया जाता है, जो बच्चे वहीं बना कर खाते हैं। वही बच्चे घर आकर भी अपना नाश्ता बना कर खा लेते हैं। हालाँकि यूरोपीय भोजन भारतीय पाक-कला से कोसों दूर है, मगर चावल या कुछ हल्का-फुल्का तल कर खाने के लिए उन्हें अभिभावक की जरूरत नहीं पड़ती। आजकल स्कूलों में कुछ एशियाई डिश बनाने भी सिखाए जा रहे हैं।

गांधी के विद्यालय में भी गेंहू पीसने से लेकर भोजन बनाने की शिक्षा दी जाती थी। बल्कि बाद में बच्चे कैरेमल कॉफी भी बनाने लगे थे। यह बाल-श्रम से अलग देखा जाना चाहिए क्योंकि उद्देश्य मजदूरी नहीं, स्वावलंबन था। ऐसी परंपरा भारतीय आश्रमों और गुरुकुलों में वर्णित रही है। कुछ हद तक तॉलस्तॉय आश्रम में बनायी गयी चीजों की बिक्री से उसका खर्च भी वहन होता था।

गांधी के आश्रम में विभिन्न धर्मों के विषय में शिक्षा का भी विवरण है। यह एक कठिन कार्य है, और इससे विवाद भी उत्पन्न हो सकते हैं। मगर उनकी मान्यता थी कि विभिन्न आस्थाओं की साधारण समझ होने से आपसी विवाद घट सकते हैं।

नॉर्वे उन गिने-चुने देशों में है जहाँ विद्यालयों में धर्म शिक्षा अनिवार्य है। इस विषय का नाम है- KRLE जिसका अर्थ है आस्था, जीवनशैली, नैतिकता। हालाँकि यह एक संवैधानिक ईसाई देश है और नब्बे प्रतिशत से अधिक जनसंख्या ईसाई है, लेकिन इस विषय में सभी प्रमुख आस्थाओं की शिक्षा दी जाती है। बल्कि नास्तिकता भी पाठ्यक्रम का हिस्सा है।

इसके पाठ्यक्रम में एक लक्ष्मी और गणेश के चित्रों को रंग भरने का पाठ है, जो ईसाई बच्चे पूरे उत्साह से करते हैं। भले वे कभी जीवन में भारत जाएँ या न जाएँ, उनके लिए यह आस्था अनसुनी या अनदेखी नहीं होगी। अन्य पश्चिमी देशों के तमाम आलोचनाओं के बावजूद भी नॉर्वे इस पर अड़ा है। उनका मानना है कि धार्मिक विवादों को घटाने का रास्ता इससे मुँह मोड़ना नहीं बल्कि इसकी साधारण समझ है। कुछ ऐसा ही जैसे यौन हिंसा को घटाने का रास्ता यौन शिक्षा माना जाता है।

1917 में गांधी ने एक पाठ्यक्रम सुझाया था। इसमें पहली कक्षा में मात्र मौखिक शिक्षा थी। रंगों, आकारों और चीजों के बारे में। बच्चों को लिपि शिक्षा उसके बाद शुरू करने का प्रस्ताव था। नॉर्वे के विद्यालयों में हू-ब-हू यही पाठ्यक्रम है, और यह ताज्जुब भी होता है कि शुरुआत ककहरे से क्यों नहीं कराते! आधी से अधिक दुनिया तो शुरुआत वर्णमाला से ही कराती है।

मगर गौर किया जाए तो वर्णमाला इतनी सरल चीज नहीं कि बच्चा शुरुआत वहीं से करे। क से कबूतर सिखाने से पहले यह तो बताना होगा कि कबूतर है किस चिड़िया का नाम। जब वह चिड़िया, पशुओं, रंगों, पेड़-पौधों से परिचित होने लगेगा, बोलने लगेगा, उनके चित्र बनाने का प्रयास करेगा, उसके बाद उसे धीरे-धीरे वर्णमाला तक ले जाया जा सकता है। अन्यथा वह बिना समझे-बूझे सुलेख के पन्ने भरता चला जाएगा और सोचता रहेगा कि आखिर पचास बार क, ख, ग क्यों लिखा। वह खरगोश कब देखूँगा जो ख से होता है, और आखिर वह ख से होता ही क्यों है?

उसी पाठ्यक्रम में गांधी ने आत्म-विश्लेषण की बात कही थी, जिसके अनुसार नियमित समय पर छात्र अपना ही विश्लेषण सामने रखेंगे। इसे कई आधुनिक विद्यालय ‘सेल्फ एसेसमेंट’ कहते हैं, जिसमें छात्र स्वयं को अलग-अलग मानकों पर आँकता है। ऐसा खिलाड़ियों को करते हुए देखा जाता है। क्रिकेटर राहुल द्रविड़ ने एक बार कहा कि अपनी रिकॉर्डिंग देख कर अपनी बल्लेबाजी सुधारी। किन्ही डॉन ब्रैडमेन या ब्रायन लारा की नहीं बल्कि अपनी बल्लेबाजी!

यह तार्किक भी है। किसी फोन का नया मॉडल उसका अपना ही परिष्कृत रूप होता है, वह कोई दूसरा फोन लाकर नहीं रख देते। हमें अपने-आप को ही तो बेहतर करना है।

नॉर्वे के प्राथमिक विद्यालयों में भी हर तिमाही विद्यार्थियों को अपना विश्लेषण जमा करना होता है। जैसे वह स्वयं स्वीकारें कि गणित में रुचि नहीं आ रही, अंग्रेजी बेहतर है, मुझे बास्केटबॉल खेलना अच्छा लग रहा है। इसके साथ-साथ शिक्षक भी अपना विश्लेषण रखते हैं, और उनके मिलान करने पर चित्र स्पष्ट होता है। अच्छी बात यह है कि यह आत्म-विश्लेषण जीवन भर काम आता है, जब हम अपनी आलोचना स्वयं कर पाते हैं। अपनी कमियों को खुद सामने रखते हैं।

गांधी मॉडल कोई अनूठा या अपूर्व मॉडल नहीं है। न ही नॉर्वे या किसी भी देश ने गांधी को पढ़ कर उसकी नकल की होगी। यह तो प्राकृतिक और सार्वभौमिक मॉडल है, जिसे कमोबेश अधिकांश प्राथमिक विद्यालय रखना चाहेंगे।

[यह लेख शिक्षा विभाग, बिहार की पत्रिका ‘निपुण संवाद’ में पूर्व में प्रकाशित हो चुका है]

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रजी अहमद एक उभरते हुए कंटेंट राइटर हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग दो वर्षों का अनुभव है। उन्होंने न्यूज़ अरोमा में काम करते हुए विभिन्न विषयों पर लेखन किया और अपनी लेखन शैली को मजबूत बनाया। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कंटेंट राइटिंग, न्यूज़ लेखन और मीडिया से जुड़े विभिन्न पहलुओं में अच्छा अनुभव हासिल किया। वह लगातार सीखते हुए अपने करियर को आगे बढ़ा रहे हैं।