संसद-विधानमंडलों में ही नहीं, पीएसयू में बड़े पदों पर भी कम है महिलाओं की भागीदारी

संसद और विधानमंडलों में महिला आरक्षण पर बहस के बीच सीपीएसई में महिलाओं की भागीदारी 10 प्रतिशत से कम है, जबकि सुपरवाइजर स्तर पर प्रतिनिधित्व और भी कम है।

Razi Ahmad
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नयी दिल्ली: संसद और विधानमंडलों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण लागू करने में हो रही देरी को लेकर जारी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोपों के बीच विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं ने सरकारी उपक्रमों में महिला कर्मचारियों की बेहद कम संख्या जैसे एक और बड़े मुद्दे की ओर ध्यान दिलाया है।

सरकार के उपलब्ध ताजा आंकड़ों के अनुसार, केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (सीपीएसई) में कुल कर्मचारियों में महिलाओं की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से भी कम है और 10 में से एक महिला भी सुपरवाइजर स्तर तक नहीं पहुंच पाती है।

निजी क्षेत्र में भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी पर्याप्त नहीं है, लेकिन वहां करीब एक-चौथाई महिलाएं प्रबंधन से जुड़े पदों पर हैं। विभिन्न सर्वेक्षणों के अनुसार, शुरुआती स्तर की नौकरियों में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 33 प्रतिशत है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश में कुल महिला श्रम बल भागीदारी दर (एलएफपीआर) 34 प्रतिशत से कुछ अधिक है जबकि वित्त वर्ष 2024-25 के अंत में यह 40 प्रतिशत थी।

ताजा सार्वजनिक उपक्रम सर्वेक्षण के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 के अंत में सीपीएसई में कुल कर्मचारियों में महिलाओं की हिस्सेदारी 9.8 प्रतिशत थी। वित्त वर्ष 2023-24 में यह संख्या 77,625 थी, जो 2024-25 में घटकर 76,685 रह गई। कई वर्षों से यह आंकड़ा 10 प्रतिशत से नीचे बना हुआ है।

सरकार की ओर से जारी इस सर्वेक्षण में कहा गया है कि सीपीएसई में कुल महिला कर्मचारियों में से 32.4 प्रतिशत प्रबंध या कार्यकारी स्तर पर थीं, जबकि 8.7 प्रतिशत सुपरवाइजर स्तर पर और 58.9 प्रतिशत कर्मचारी श्रेणी में थीं।

सुपरवाइजर स्तर पर महिलाओं की हिस्सेदारी 2022-23 में 10.08 प्रतिशत थी, जो घटकर 2023-24 में 9 प्रतिशत रह गई है।

वाईएसआर कांग्रेस पार्टी की सांसद डॉ. गुम्मा तनुजा रानी ने कहा कि सरकारी कंपनियों में महिलाओं का कम प्रतिनिधित्व चिंता का विषय है, खासकर तब जब संसद और विधानमंडलों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को लेकर राजनीतिक बहस जारी है।

उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “इस देश की महिलाओं ने संसद में जगह और कार्यस्थल पर अपनी आवाज के लिए लंबे समय से उचित अवसर का इंतजार किया है।

केंद्र सरकार और विपक्ष एक-दूसरे पर लोकसभा और राज्य विधानमंडलों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने में देरी का आरोप लगा रहे हैं।

लोकसभा में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की बात की जाए तो पहली लोकसभा में यह पांच प्रतिशत था, जो वर्तमान लोकसभा में 15 प्रतिशत है। इसके अलावा किसी भी राज्य विधानमंडल में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 20 प्रतिशत नहीं है। कुछ राज्यों, जैसे हिमाचल प्रदेश में तो केवल एक महिला विधायक है।

वाईएसआर कांग्रेस सांसद ने कहा, “असल चिंता हमारे अपने सार्वजनिक क्षेत्र में है, जहां महिलाओं की संख्या 10 प्रतिशत से भी कम है और पिछले 10 साल से इसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। सुपरवाइजर स्तर पर स्थिति और भी खराब है।”

उन्होंने कहा कि कई महिलाएं सार्वजनिक उपक्रम खनन और विनिर्माण जैसे पुरुष प्रधान क्षेत्रों में काम करती हैं, जहां काम के मुश्किल घंटे, लचीली कार्य व्यवस्था की कमी और सुरक्षित आवास या स्कूलों का अभाव, अनिवार्य तबादले महिलाओं को बीच करियर में नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर करते हैं।

उन्होंने हर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम में महिलाओं की भर्ती के लिए स्पष्ट और समयबद्ध लक्ष्य तय करने तथा विशेष रूप से खनन और औद्योगिक कंपनियों में बाल देखभाल केंद्र, छात्रावास, सुरक्षित परिवहन और ड्यूटी में लचीलापन जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने का सुझाव दिया।

उन्होंने कहा, “चयन और पदोन्नति बोर्ड में महिलाओं और पुरुषों की समान भागीदारी होनी चाहिए और प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए।”

उन्होंने कहा कि जो महिलाएं कुछ समय नौकरी छोड़ने के बाद दोबारा काम शुरू करना चाहती हैं, उनके लिए ऐसी योजनाएं बनाई जानी चाहिए जिनमें उन्हें दोबारा नौकरी पाने में मदद मिले और वेतन भी मिले।

उन्होंने यह भी कहा कि जो कंपनियां महिलाओं को काम के समय में सुविधा देती हैं और बच्चों की देखभाल की व्यवस्था करती हैं, उन्हें सरकार की ओर से कर में छूट दी जानी चाहिए।

क्षेत्रवार आंकड़ों में भी सीपीएसई में महिलाओं के असमान प्रतिनिधित्व का पता चलता है।

सर्वेक्षण के अनुसार, कोयला, दूरसंचार और सूचना प्रौद्योगिकी तथा रक्षा उत्पादन ऐसे क्षेत्रों में कुल कर्मचारियों की तुलना में महिलाओं की संख्या सबसे अधिक है।

सामाजिक कार्यकर्ता रंजना कुमारी ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि सरकारी सीपीएसई में महिलाओं की कम संख्या को समझने के लिए यह भी देखना होगा कि देश की अर्थव्यवस्था में महिलाएं किस तरह के काम कर रही हैं और उन्हें किस तरह के रोजगार मिल रहे हैं।

उन्होंने कहा कि सीपीएसई परंपरागत रूप से पुरुष प्रधान रहे हैं और महिलाओं को ज्यादातर शुरुआती स्तर के पदों पर रखा जाता है, जहां पदोन्नति के अवसर सीमित होते हैं।

कुमारी ने कहा, “महिलाओं के लिए नौकरियों की संख्या और प्रकार ही नहीं, बल्कि इन कंपनियों में नौकरियों की प्रकृति भी बड़ी चिंता का विषय होनी चाहिए।”

उन्होंने भर्ती में भेदभाव, तबादला और तैनाती की नीतियों, बच्चों की देखभाल के लिए अपर्याप्त सुविधाओं और ऐसे कार्यस्थलों का भी जिक्र किया जो महिलाओं की जरूरतों के प्रति पर्याप्त संवेदनशील नहीं हैं।

उन्होंने कहा, “अभी भी महिलाओं को ज्यादातर कम वेतन वाली नौकरियों, छोटे-छोटे स्वरोजगार या घर-परिवार के कामों तक ही सीमित रखा जाता है, जिनमें कोई पैसा नहीं मिलता।”

कुमारी ने कहा कि सरकार को महिलाओं को उद्योग आधारित प्रशिक्षण दिलाकर प्रभावी व्यवस्था तैयार करनी चाहिए, न कि कौशल विकास को केवल पारंपरिक क्षेत्रों तक सीमित रखना चाहिए।

उन्होंने कहा कि महिलाओं को नौकरी में बनाए रखने और भागीदारी बढ़ाने के लिए चार चीजों बच्चों की देखभाल की सुविधा, सुरक्षित आने-जाने की व्यवस्था, काम से जुड़े प्रशिक्षण और सामाजिक सुरक्षा पर ध्यान देना जरूरी है।

पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएफआई) की कार्यकारी निदेशक पूनम मुटरेजा ने कहा कि महिलाओं के काम करने में आने वाली परेशानियां सामाजिक और व्यवस्था दोनों से जुड़ी हैं और इन्हें केवल इस आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए कि महिलाएं काम करना चाहती हैं या नहीं।

उन्होंने पीएफआई के हालिया अध्ययन का हवाला देते हुए कहा कि महिलाओं की नौकरी करने की भागीदारी पर कई चीजों का असर पड़ता है, जिनमें परिवार की देखभाल की ज्यादा जिम्मेदारी, घर के कामों में पुरुषों की कम भागीदारी, महिलाओं की सीमित आवाजाही, कौशल सीखने के कम अवसर, घर के पास नौकरी के कम विकल्प, काम के लिए यात्रा करते समय सुरक्षा की चिंता और आने-जाने की खराब सुविधा शामिल हैं।

मुटरेजा ने कहा कि केवल श्रम में भागीदारी और वास्तविक आर्थिक सशक्तिकरण में अंतर होता है।

उन्होंने कहा, “महिलाएं बड़ी संख्या में असंगठित और असुरक्षित कामों में लगी हुई हैं, जबकि कई औपचारिक व परंपरागत रूप से पुरुषों के वर्चस्व वाले क्षेत्रों में उनके लिए प्रवेश करना अभी भी मुश्किल है।”

उन्होंने बाजार की जरूरतों के अनुसार कौशल प्रशिक्षण, बच्चों की देखभाल की सुविधा, सवैतनिक मातृत्व अवकाश, सुरक्षित आवाजाही तथा भर्ती व पदोन्नति में निष्पक्ष व्यवस्था की मांग की।

ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया (टीआरआई) की लैंगिकता मामलों की विशेषज्ञ डॉ. सीमा भास्करन ने कहा कि भारत में पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्था लड़कियों और महिलाओं के लिए कई तरह की बाधाएं पैदा करती है।

उन्होंने कहा कि इनमें अच्छी और तकनीकी शिक्षा तक सीमित पहुंच, रोजगार बदलने के कम अवसर, परिवार पर आर्थिक और भावनात्मक निर्भरता तथा सामाजिक दबाव शामिल हैं।

उन्होंने कहा, “महिलाओं और पुरुषों की भूमिकाओं और योगदान को लेकर मौजूद लैंगिक भेदभाव इस समस्या को और बढ़ाता है। महिलाओं को अक्सर पारंपरिक और तय भूमिकाओं के लिए ही प्राथमिकता दी जाती है।”

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रजी अहमद एक उभरते हुए कंटेंट राइटर हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग दो वर्षों का अनुभव है। उन्होंने न्यूज़ अरोमा में काम करते हुए विभिन्न विषयों पर लेखन किया और अपनी लेखन शैली को मजबूत बनाया। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कंटेंट राइटिंग, न्यूज़ लेखन और मीडिया से जुड़े विभिन्न पहलुओं में अच्छा अनुभव हासिल किया। वह लगातार सीखते हुए अपने करियर को आगे बढ़ा रहे हैं।