
राजीव गांधी कंप्यूटर और दूरसंचार को भारत में आगे बढ़ाने के बड़े समर्थक थे। उन्हें आधुनिक तकनीक में इतनी दिलचस्पी थी कि उनके दौर में कंप्यूटर के प्रयोग को बढ़ावा देने की दिशा में कई अहम फैसले लिए गए, और इसी वजह से उन्हें भारत की कंप्यूटर क्रांति से जोड़ा जाता है। एक और रोचक बात यह है कि तकनीक के साथ-साथ उन्हें फ्लाइंग, फोटोग्राफी और संगीत का भी शौक था। यानी वे सिर्फ नीति-निर्माता नहीं, बल्कि एक ऐसे शख्स थे जिनकी रुचि आधुनिक दुनिया की कई चीज़ों में थी। वे नए-नए प्रयोगों और ताज़ा विचारों को लेकर काफी उत्सुक रहते थे, इसलिए तकनीक उनके लिए सिर्फ शौक नहीं, बल्कि सोचने का तरीका भी थी।
भारत में कंप्यूटर क्रांति आसान नहीं थी। इसकी सबसे बड़ी चुनौती विरोध और डर था। उस समय बहुत से लोगों को लगा कि कंप्यूटर आने से नौकरियाँ घटेंगी, विदेशी कंपनियों का असर बढ़ेगा, और पारंपरिक कामकाज पर असर पड़ेगा। दूसरी बड़ी मुश्किल थी महंगा और सीमित इंफ्रास्ट्रक्चर। शुरुआती दौर में कंप्यूटर बहुत महंगे थे, बिजली, प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता भी कम थी, इसलिए उन्हें बड़े पैमाने पर लागू करना आसान नहीं था। एक और चुनौती नीतिगत और वैचारिक बहस थी। 1985 के आसपास जब कंप्यूटर के उपयोग को बढ़ाने की बात हुई, तो कई राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में इसका विरोध हुआ, लेकिन उसी ने आगे चलकर भारत में कंप्यूटर और आईटी के विस्तार की जमीन तैयार की।
राजीव गांधी ने इसे एक एक-तरफा “कम्प्यूटर लाओ” अभियान की तरह नहीं, बल्कि नीतियों, संस्थानों और प्रशिक्षण के जरिए आगे बढ़ाया। उनके दौर में कंप्यूटर और टेलीकॉम को बढ़ावा देने के लिए आयात शुल्क घटाने, दूरसंचार ढांचा मजबूत करने और सरकारी मशीनरी को तकनीक अपनाने के लिए तैयार करने जैसी पहलें की गईं।
उन्होंने तकनीक को गांव और आम लोगों तक ले जाने की कोशिश भी की, ताकि यह सिर्फ बड़े शहरों या दफ्तरों तक सीमित न रहे। इसी सोच से दूरसंचार विस्तार, कंप्यूटरीकृत सेवाओं और नई शिक्षा-नीतियों को भी बढ़ावा मिला। राजनीतिक स्तर पर उनकी सबसे बड़ी ताकत यह थी कि वे तकनीक को विकास का औजार मानते थे, न कि केवल आधुनिक दिखने वाली चीज़। इसलिए उन्होंने विरोध के बावजूद सुधारों को संस्थागत रूप देने की कोशिश की, ताकि बदलाव सिर्फ भाषण तक सीमित न रहे।
राजीव गांधी की कंप्यूटर नीति का असली असर यह था कि उसने भारत में तकनीक को सरकारी दफ्तरों की चीज़ से निकालकर धीरे-धीरे आम विकास-नीति का हिस्सा बना दिया। उनके दौर में कंप्यूटर को लोकप्रिय बनाने, विभागीय ढांचा खड़ा करने, और दूरसंचार व इलेक्ट्रॉनिक्स को बढ़ावा देने की दिशा में काम हुआ, जिससे आगे चलकर आईटी सेक्टर के लिए जमीन तैयार हुई। इसका सबसे बड़ा फायदा यह रहा कि कंप्यूटर सस्ता और ज्यादा उपलब्ध होने लगा, और निजी क्षेत्र को भी सॉफ्टवेयर व तकनीकी सेवाओं में आगे बढ़ने का मौका मिला। बाद में रेलवे रिजर्वेशन जैसे कामों में कंप्यूटर के उपयोग और निजी कंपनियों के सॉफ्टवेयर विकास ने दिखाया कि यह नीति सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं थी, बल्कि व्यावहारिक बदलाव ला रही थी।
दूसरा बड़ा असर यह पड़ा कि भारत ने तकनीकी आधुनिकता को एक राष्ट्रीय लक्ष्य की तरह देखना शुरू किया। “कंप्यूटर क्रांति” ने यह सोच मजबूत की कि विकास का रास्ता सिर्फ उद्योग या खेती नहीं, बल्कि सूचना-प्रौद्योगिकी भी है, और इसी सोच ने आगे चलकर भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की नींव रखी। हालांकि यह बदलाव बिना विरोध के नहीं हुआ। शुरुआत में नौकरियाँ जाने, विदेशी निर्भरता बढ़ने और लागत के डर जैसे सवाल उठे, लेकिन समय के साथ यह साफ हुआ कि कंप्यूटर ने कामकाज की रफ्तार, पारदर्शिता और सेवाओं की पहुंच बढ़ाई।पहले टिकट या रिकॉर्ड जैसे काम में घंटों लगते थे, लेकिन कंप्यूटरीकरण से वही प्रक्रिया तेज, सटीक और बड़े स्तर पर संभव हो गई। यही छोटा बदलाव आगे चलकर बड़े आईटी परिवर्तन का आधार बना।

