
कृष्ण गोपाल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह को लगातार दूसरे कार्यकाल का विस्तार मिलने की खबर ने एक बड़े प्रश्न को फिर सामने ला दिया है। प्रश्न किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था की कार्यप्रणाली का है। देश में हजारों ऐसे विद्वान, शोधकर्ता और अनुभवी शिक्षाविद् हैं जो कुलपति बनने की योग्यता रखते हैं। फिर भी बार-बार वही सीमित समूह अलग-अलग विश्वविद्यालयों में कुलपति बनता दिखाई देता है, और कई बार एक ही विश्वविद्यालय में दूसरा कार्यकाल भी प्राप्त कर लेता है।
निस्संदेह, उत्कृष्ट कार्य करने वाले व्यक्ति को पुनः अवसर मिलना चाहिए। किन्तु जब नेतृत्व के अवसर बार-बार कुछ चुनिंदा नामों तक ही सीमित रह जाएं, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या हमारी व्यवस्था नए और समान रूप से योग्य नेतृत्व को पर्याप्त अवसर दे रही है? वास्तविकता यह है कि ऐसे नियुक्तियों में केवल योग्यता ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक अनुभव, सरकार की नीतियों के प्रति विश्वास, संस्थागत स्वीकार्यता और पेशेवर नेटवर्क-सभी की भूमिका होती है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब विश्वास धीरे-धीरे संरक्षण (Patronage) की संस्कृति में बदलने लगता है, जहाँ अवसरों का दायरा सिमट जाता है और अनेक योग्य शिक्षाविद् केवल दर्शक बनकर रह जाते हैं।
यह किसी एक सरकार का नहीं, बल्कि दशकों से चली आ रही भारतीय व्यवस्था का प्रश्न है। सरकारें बदलती रही हैं, परन्तु अपने-अपने “विश्वसनीय” लोगों का एक सीमित दायरा अक्सर बना रहता है। यदि भारत को वास्तव में विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय बनाने हैं, तो कुलपति नियुक्तियों में व्यापक प्रतिभा, पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा और अवसर की समानता को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। विश्वविद्यालयों का भविष्य तभी उज्ज्वल होगा, जब नेतृत्व कुछ परिचित चेहरों तक सीमित न रहकर पूरे अकादमिक समुदाय की श्रेष्ठ प्रतिभाओं के लिए खुला होगा।

