भाई-बहन के परम पवित्र प्रेम का स्मारक पर्व है रक्षाबंधन

रक्षाबंधन भाई-बहन के पवित्र प्रेम, त्याग और सुरक्षा का पर्व है। पौराणिक कथाओं से जुड़ा यह त्योहार राखी के धागे में विश्वास और आशीर्वाद की शक्ति दर्शाता है।

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डॉ जंग बहादुर पांडेय

श्रावणी की रसवंती झड़ी में जिस प्रकार कृषकों के नयनों में उल्लास छाया रहता है, उसी प्रकार श्रावणी पूर्णिमा के दिन उन बहनों के आनंद का कूल-किनारा नहीं दीखता, जिनके भाई रक्षासूत्र बंधवाने के लिए उपस्थित हों। किंतु, सूखे के मौसम में जिस तरह कृषकों के भोले चेहरे पर उदासी की पूरी वर्णमाला अंकित हो जाती है, उसी तरह उन बहनों की मायूसी को कौन भाप सकता है, जिनके भाई नहीं हों या उस दिन कहीं चले गए हों।

वस्तुतः, रक्षाबंधन भाई-बहन के परम पवित्र प्रेम का स्मारक पर्व है। वे दो नाजुक धागे त्याग और प्रेम के प्रतीक है। इन रेशमी धागों में इतनी शक्ति है, जितनी लोहे की जंजीरों में भी नहीं। लौहश्रृंखला को झटक देना आसान है, किंतु जो भी बहन के इस प्रेमबंधन में बंध गया, उसके लिए इसे तोड़कर निकल जाना असंभव है। भाई-बहन के इस दिव्य प्रेम की अनेकानेक विस्मयकारिणी कहानियाँ सुनी जाती हैं। लुटेरे हत्यारे तक ने अपने गिरोह के सरदार के आदेश की अवज्ञा कर उस रमणी की रक्षा की, जिसने कभी उसकी कलाई में राखी बांधी थी। इस प्रकार, न मालूम कितने भाइयों ने अपनी बहनों की राखियों की लाज रखने के लिए अपने को तलवार की धार से भिड़ा दिया, विपत्तियों के व्यूह का भेदन बड़ी ही वीरता के साथ किया। इसका बड़ा ही रोमांचकारी वर्णन स्वर्गीय वृंदावनलाल वर्मा ने अपने ‘राखी की लाज’ नामक नाटक में किया है।

पुराणों में रक्षाबंधन की कथा मिलती है। एक बार युधिष्ठिर ने सांसारिक संकटों से मुक्ति का उपाय श्रीकृष्ण से पूछा। श्रीकृष्ण ने कहा कि वही उपाय बताता हूँ, जो उपाय इंद्र की रक्षा के लिए इंद्राणी ने किया था। प्राचीन काल में एक बार बड़ा भीषण देवासुर-संग्राम छिड़ा। देवता पराजित तथा असुर विजयी हो रहे थे। स्थिति यहाँ तक बिगड़ी कि देवेंद्र भी पराजित हो गए। वे अब अपनी राजधानी छोड़कर भागने को उद्यत हो गए। इंद्राणी ने श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन विधिपूर्वक तैयार किए रक्षाकवच को इंद्र के दाहिने हाथ में बाँधा। इसका बड़ा ही अद्भुत परिणाम हुआ । देवेंद्र का मस्तक विजय तिलक से विभूषित हुआ और दानवेंद्र राजा बलि बाँध लिए गए। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि उपर्युक्त पद्धति से जो मनुष्य रक्षाबंधन पाते हैं, उनके पास सालभर न तो रोग आता है और न कोई अशुभ व्यापता है-

सर्वरोगोपशमनं सर्वाशुभविनाशनम् ।
सकृत्कृतेनाब्दमेकं येन रक्षाकृतो भवेत् ॥

पौराणिक कथा है कि रक्षा बंधन के दिन स्वयं लक्ष्मी ने राजा बलि के हाथ मे रक्षा सूत्र बांधकर वामन रूप में विराजमान विष्णु को बलि के बंधन से मुक्त कराया था। इस रक्षाबंधन के दिन ब्राह्मणों का समुदाय रंग-बिरंगे रक्षासूत्र यजमानों के हाथों में बाँधने निकल जाता है। अनेक छोटे-छोटे बच्चे भी गाँवों-नगरों में अनजाने अपरिचित लोगों को रोककर उनके हाथों में रक्षासूत्र बाँधते हैं।

रक्षासूत्र बाँधते हुए ये पंडित श्लोक पढ़ते हैं-

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वां प्रतिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल ॥

इस प्रकार, यह त्योहार भाई-बहन के दिव्य प्रेम एवं पुरोहित-यजमान के सद्भाव की याद दिलाने के लिए उपस्थित होता है। रक्षा कवच द्वारा राष्ट्र की भगिनीशक्ति यदि एक ओर अपने भ्राताओं पर शुभकामनाओं एवं आशीर्वादों की अमृतवर्षा करती हैं, तो दूसरी ओर सबल भ्रातृगण अपने राष्ट्र के अबला समुदाय के अभयदान के लिए कृतसंकल्प हो जाते हैं। इसी दिन ब्राह्मणवर्ग, अर्थात ज्ञान का आराधकवर्ग अवशिष्ट जनता पर अपनी मंगलकामनाओं का मंदाकिनी-वारि छिड़कता है। आएँ, हम सभी कुकुम, मिष्टान एवं राखियों में सजी धालियाँ लिए बहनों तथा आशीर्वादों की झोली लिए पूज्य गुरुओं के समक्ष अपने कर्म के प्रतीक दाहिने हाथ को राखियों से सुसज्जित होने के लिए बढ़ा दें- हमारी कर्मशक्ति इतनी अनंतगुणित हो जाएगी कि हमारी वैयक्तिक एवं राष्ट्रीय विजय निश्चित है।

लेखक रांची विश्वविद्यालय के पीजी हिन्दी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष हैं।

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विनीता चौबे को 10 साल का अनुभव है। उन्होनें सन्मार्ग से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। फिर न्यूज विंग, बाइस स्कोप, द न्यूज पोस्ट में भी काम किया। वे राजनीति, अपराध, सामाजिक मुद्दों और स्थानीय घटनाओं से जुड़ी खबरों को सरल और तथ्यात्मक भाषा में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जानी जाती हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका प्रयास रहता है कि जमीनी स्तर की महत्वपूर्ण खबरों को सही और विश्वसनीय जानकारी के साथ लोगों तक पहुंचाया जाए।