

विवेकानंद सिंह कुशवाहा





रिजर्वेशन हटाने की बात करने वाले अचानक आरक्षण की समीक्षा की बात करने लगे। ये गिरगिट से भी तेज रंग बदल रहे हैं। इनलोगों ने कभी जाति जनगणना की मांग नहीं की, आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी की बात नहीं की। असल में ये चाहते हैं कि SC के खिलाफ SC और OBC के खिलाफ OBC को खड़ा किया जाये। ये नेरेटिव खड़ा करना चाहते हैं कि 22.5 प्रतिशत के SC/ST आरक्षण का बड़ा हिस्सा कोई एक ही खा जा रहा है। OBC के 27 प्रतिशत का बड़ा हिस्सा चार-पांच जातियां खा जा रहीं। जबकि बिहार, झारखंड जैसे कई राज्यों में तो पिछड़े और अतिपिछड़े का आरक्षण दो हिस्सों में बंटा हुआ है। OBC के साथ अछूत का भाव नहीं रहा तो क्रीमीलेयर की भी व्यवस्था है। इसके बावजूद ये लोग फर्जी नेरेटिव चलाये पड़े हैं। ये लोग आपको यह कभी नहीं बतायेंगे कि भाई-भतीजावाद में लिपटे इस भ्रष्ट देश में ये लोग मेरिट के नाम पर आपका कितना हिस्सा खा चुके हैं?
OBC और SC/ST समाज का दुर्भाग्य यह है कि इस वर्ग का बड़ा हिस्सा आज भी अपनी लड़ाई लड़ना नहीं जानता, वह चाहता है कि कोई नेता/मसीहा आये और उसकी लड़ाई लड़ दे। वह लाभ तो चाहता है, लेकिन लड़ने के लिए शक्ति संसाधन नहीं है उसके पास। आपको बोलने, लिखने की आदत डालनी होगी। आज हमारे ज्यादातर नेता गमले के फूल हैं, जिन्होंने संघर्ष को सिर्फ किताबों में पढ़ा है। कभी खुद संघर्ष नहीं किया। सहयोगियों के मुंह से सुना है संघर्ष के बारे में। फिर भी चिराग भाई बोल रहे हैं, ठीक लगा।
इस देश के वंचितों को ज्योतिबा फुले, पेरियार, डॉ आंबेडकर, जयपाल सिंह मुंडा, कर्पूरी ठाकुर, जगदेव प्रसाद, रामस्वरूप वर्मा, डॉ लोहिया, उपेंद्र वर्मा, ललई सिंह यादव, कांशीराम, करुणानिधि, वीपी सिंह, शरद यादव, रामविलास पासवान, मुलायम सिंह यादव, लालू यादव, नीतीश कुमार जैसे दर्जनों नेताओं का हमेशा शुक्रगुजार रहना चाहिए, जिन्होंने आपके हक अधिकार के लिए अपने हिसाब से लड़ाई लड़ी।
इन जैसे ज्ञात/अज्ञात कई लोगों की मुखरता ने देश में आरक्षण की व्यवस्था को लागू होने दिया। अन्यथा OBC आरक्षण को तो चार दशक तक रोकने की तमाम कोशिशें हुईं। O-BC समाज तो अपने योद्धाओं के प्रति भी कृतघ्न रहा है। हम जातीय आधार पर तो तुरंत एकजुट हो जाते हैं, लेकिन वर्गीय आधार पर हमारी जातीय संकीर्णता हम पर हावी हो जाती है। हमारे ज्यादातर योद्धाओं का संकट भी यह रहा कि अंत में पुत्र/परिवार और जाति के मोह में पड़ गये।
आज जब बात प्राइवेट सेक्टर में हिस्सेदारी की होनी थी, तो बात आरक्षण की समीक्षा की होने लगी। क्योंकि, आरक्षण को खत्म करने की चाह रखने वालों के पीछे बड़ी-बड़ी ताकतें खड़ी हैं। वैसे, आरक्षण का विरोध करने वाले एक बात समझ लें कि आरक्षण एक मशाल है, जिसने वंचितों के अंधेरे हिस्से में रोशनी पहुंचाई है। उसको बुझाने की ताक़त अभी किसी में नहीं है, जो ऐसी कोशिश करेगा, वह राजनीतिक रूप से दफ़न हो जायेगा। हां, मैं पिछड़े वर्ग से जरूर हूं, लेकिन पिछड़ी सोच नहीं रखता। जाति जनगणना के आंकड़े आने के बाद अवश्य समीक्षा करिए कि क्या सामाजिक न्याय की दिशा में जो प्रयास किये गये, वह काफी हैं या नाकाफी?
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
