8 याचिकाओं पर एक साथ हुई सुनवाई
न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने इस मामले में दाखिल आठ रिट याचिकाओं पर सुनवाई की। याचिकाकर्ताओं ने नगर निगम के 14 अक्टूबर 2014, 4 दिसंबर 2014 और 13 फरवरी 2015 के आदेशों को चुनौती दी थी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक नगर निगम दोबारा सुनवाई कर अंतिम निर्णय नहीं लेता, तब तक संबंधित दुकानों पर याचिकाकर्ताओं का कब्जा प्रभावित नहीं किया जाएगा।
1966-67 से जुड़ा है जमीन आवंटन का मामला
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता सुमित गाड़ोदिया ने अदालत में पक्ष रखते हुए बताया कि जालान रोड की करीब 5100 वर्गफीट जमीन वर्ष 1966-67 में तत्कालीन रांची नगरपालिका ने मोहन लाल कच्ची को आवंटित की थी। यहां टेंट हाउस का कारोबार संचालित होता था।
बाद में उनके उत्तराधिकारी महेंद्र कुमार कच्ची ने वर्ष 2000 में कुछ प्रार्थियों के साथ साझेदारी में कारोबार शुरू किया। साझेदारी समाप्त होने के बाद जमीन को प्रार्थियों के नाम दोबारा आवंटित करने का अनुरोध किया गया था।
2003 में हुआ पुनः आवंटन, फिर शुरू हुआ विवाद
अदालत को बताया गया कि रांची नगर निगम ने 9 दिसंबर 2003 को जमीन प्रार्थियों के नाम आवंटित की थी। इसके बाद 5 जून 2004 को लाइसेंस शुल्क के आधार पर समझौता हुआ और 6 अगस्त 2004 को जमीन पर स्थायी निर्माण की अनुमति भी दी गई।
हालांकि, बाद में दुकानों के पुनः आवंटन को लेकर विवाद शुरू हो गया। निगम ने 9 सितंबर 2014 को कारण बताओ नोटिस जारी किया और जवाब मिलने के बाद लाइसेंस रद्द करने का आदेश पारित कर दिया।
निगम ने लगाया लाइसेंस की शर्तों के उल्लंघन का आरोप
रांची नगर निगम की ओर से अधिवक्ता राहुल कुमार ने याचिकाओं का विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि दुकानदारों ने लाइसेंस की शर्तों का उल्लंघन किया है और मामला दुकानों को दूसरे पक्ष को देने यानी सबलेटिंग से संबंधित है।
निगम की ओर से यह भी कहा गया कि संबंधित जमीन पर विकास कार्य कराने की आवश्यकता है। इसलिए निगम के आदेशों को उचित बताते हुए याचिकाएं खारिज करने की मांग की गई।
तीन पंक्तियों के आदेश पर हाईकोर्ट ने उठाए सवाल
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने पाया कि 14 अक्टूबर 2014 का आदेश महज तीन पंक्तियों में पारित किया गया था। इसमें दुकानदारों की दलीलों और उनके द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों पर समुचित विचार नहीं किया गया था।
अदालत ने कहा कि किसी भी वैधानिक प्राधिकार को सभी संबंधित तथ्यों और दस्तावेजों पर विचार करने के बाद ही आदेश पारित करना चाहिए।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने नगर निगम के 14 अक्टूबर 2014, 4 दिसंबर 2014 और 13 फरवरी 2015 के आदेशों को निरस्त कर दिया।
अब 12 सप्ताह में निगम को लेना होगा नया फैसला
हाईकोर्ट ने रांची नगर निगम को सभी याचिकाकर्ताओं को सुनवाई का उचित अवसर देने और दस्तावेजों पर विचार करने के बाद 12 सप्ताह के भीतर नया कारणयुक्त आदेश पारित करने का निर्देश दिया है।
फिलहाल दुकानदारों को राहत मिली है और अंतिम निर्णय होने तक उनका कब्जा बरकरार रहेगा।


