
रांची : रांची विश्वविद्यालय नीड बेस सहायक प्राध्यापक संघ, रांची के अध्यक्ष डॉ. त्रिभुवन शाही ने प्रस्तावित “रिस्ट्रक्चरिंग एवं क्लस्टरिंग सिस्टम” पर चिंता जताते हुए कहा कि यह निर्णय झारखंड की संपूर्ण उच्च शिक्षा व्यवस्था, विशेषकर ग्रामीण एवं आदिवासी बहुल क्षेत्रों के विद्यार्थियों के भविष्य के लिए अत्यंत घातक सिद्ध होगा। उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से महाविद्यालयों को संकायवार विभाजित करने एवं विषयों को अलग-अलग संस्थानों में सीमित करने का प्रयास पूरी तरह अव्यावहारिक, छात्र-विरोधी तथा शिक्षा-विरोधी है। डॉ. शाही ने कहा कि झारखंड जैसे राज्य में बड़ी संख्या में विद्यार्थी आर्थिक रूप से कमजोर, ग्रामीण, आदिवासी, दलित एवं पिछड़े परिवारों से आते हैं, जो सीमित संसाधनों के बीच अपने नजदीकी महाविद्यालयों में अध्ययन कर पाते हैं। वर्तमान व्यवस्था में एक ही महाविद्यालय में कला, विज्ञान एवं वाणिज्य संकाय उपलब्ध रहने से विद्यार्थियों को विषय चयन की स्वतंत्रता और सहज शैक्षणिक वातावरण प्राप्त होता है। किंतु “Clustering System” लागू होने के बाद विद्यार्थियों को अलग-अलग विषयों के अध्ययन के लिए दूरस्थ महाविद्यालयों में जाना पड़ेगा, जिससे उन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा। परिवहन, आवास, भोजन एवं अन्य खर्च वहन करना अधिकांश गरीब परिवारों के लिए संभव नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था का सबसे गंभीर प्रभाव आदिवासी एवं दूरदराज क्षेत्रों के विद्यार्थियों पर पड़ेगा। झारखंड के अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी यातायात एवं संसाधनों की समुचित व्यवस्था नहीं है। ऐसे में विद्यार्थियों, विशेषकर छात्राओं, के लिए दूरस्थ महाविद्यालयों में नियमित अध्ययन करना अत्यंत कठिन हो जाएगा। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में विद्यार्थी उच्च शिक्षा बीच में ही छोड़ने को विवश होंगे तथा राज्य में ड्रॉप आउट की समस्या भयावह रूप ले सकती है। इससे न केवल उच्च शिक्षा व्यवस्था चौपट होगी, बल्कि सामाजिक एवं शैक्षणिक असमानता भी और अधिक बढ़ेगी। डॉ. शाही ने कहा कि यह प्रस्ताव राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) की मूल भावना के भी विपरीत है। जहाँ नई शिक्षा नीति बहुविषयी (Multidisciplinary) शिक्षा को प्रोत्साहित करती है, वहीं यह व्यवस्था महाविद्यालयों को संकीर्ण विषय-केन्द्रित संस्थानों में बदलने का प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि वास्तविक बहुविषयी शिक्षा तभी संभव है, जब एक ही परिसर में विभिन्न संकायों एवं विषयों की उपलब्धता सुनिश्चित हो।
उन्होंने प्रस्तावित पद पुनर्गठन एवं पद समर्पण की प्रक्रिया पर भी गंभीर आपत्ति जताते हुए कहा कि विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय पहले से ही शिक्षकों एवं कर्मचारियों की भारी कमी से जूझ रहे हैं। ऐसी स्थिति में पदों को समाप्त करना शिक्षा व्यवस्था को और कमजोर करेगा। इससे शिक्षण कार्य, शोध, परीक्षा संचालन, पुस्तकालय, प्रयोगशालाएँ तथा प्रशासनिक कार्य बुरी तरह प्रभावित होंगे। डॉ. शाही ने विशेष रूप से झारखंड की जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं पर पड़ने वाले खतरे की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि संताली, हो, मुंडारी, कुड़ुख, नागपुरी, खोरठा, पंचपरगनिया एवं कुड़माली जैसी भाषाएं केवल अध्ययन का विषय नहीं, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक अस्मिता एवं आदिवासी-मूलवासी समाज की पहचान हैं। यदि इन विभागों को सीमित अथवा स्थानांतरित किया गया, तो इन भाषाओं के अध्ययन-अध्यापन पर गंभीर संकट उत्पन्न होगा तथा धीरे-धीरे ये विभाग निष्क्रिय होने लगेंगे। यह झारखंड की भाषाई एवं सांस्कृतिक विरासत पर सीधा आघात होगा।
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को शिक्षा संस्थानों को कमजोर करने के बजाय उन्हें सशक्त बनाने की दिशा में कार्य करना चाहिए। महाविद्यालयों में नियमित शिक्षकों की नियुक्ति, आधारभूत संरचना का विकास, पुस्तकालय, प्रयोगशालाएं, डिजिटल सुविधाएँ एवं शोध व्यवस्था को मजबूत करना आज की प्राथमिक आवश्यकता है। झारखंड जैसे विकासशील राज्य में उच्च शिक्षा के विस्तार की जरूरत है, न कि उसे विभाजित एवं सीमित करने की। अंत में डॉ. त्रिभुवन साही ने राज्य सरकार से मांग की कि प्रस्तावित “Restructuring एवं Clustering System” को तत्काल वापस लिया जाए तथा किसी भी नई व्यवस्था को लागू करने से पूर्व विद्यार्थियों, शिक्षकों, शिक्षाविदों एवं अभिभावकों से व्यापक विमर्श किया जाए, ताकि राज्य के शैक्षणिक और सांस्कृतिक भविष्य की रक्षा सुनिश्चित हो सके।

