
औपनिवेशिक भारत में सर अली इमाम एक मशहूर शख्सियत थे। उनकी मशहूरियत का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि वे हैदराबाद की रियासत के प्रधानमंत्री थे।1 नवंबर 1932 के द बांबे क्रॉनिकल में छपी ख़बर के अनुसार, सर अली इमाम का इंतक़ाल 30 अक्टूबर 1932 को रांची में हुआ था। निधन के बाद उन्हें रांची में ही इमाम कोठी के परिसर में सुपुर्दें खाक कर दिया गया। यहां आज भी उनकी मजार है। वे बिहार के सबसे प्रतिष्ठित नेताओं में से एक थे। 1869 में जन्मे सर अली इमाम को 1910 में भारत सरकार (Government of India) का लॉ मेंबर (Law Member) नियुक्त किया गया था। उन्होंने 1912 में बिहार को बंगाल से अलग एक स्वतंत्र प्रांत के रूप में स्थापित कराने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसके कारण उन्हें “बिहार का निर्माता” माना जाता है।
इसके बाद वे 1917 से 1920 तक निज़ाम हैदराबाद की रियासत के प्रधानमंत्री रहे। सर अली इमाम नेहरू रिपोर्ट के हस्ताक्षरकर्ताओं में से एक थे तथा मुस्लिम नेशनलिस्ट पार्टी के प्रमुख नेता के रूप में भारत की राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण योगदान दिया। 1932 में The Bombay Chronicle और 1917 में Behar Herald जैसे प्रमुख अख़बार ने बिहार के निर्माण में सर अली इमाम के योगदान को देखते हुए उन्हें “बिहार का निर्माता” माना है। लेकिन मौजूदा बिहार में इन्हें कोई जानता तक नहीं है। वैसे पटना में एक सड़क अली इमाम पथ और एक कॉलोनी अली नगर कॉलोनी इनके नाम पर है।
वैसे सर अली इमाम पटना हाई कोर्ट के जज भी रहे हैं, वाईसरॉय के एक्ज़िक्यूटिव कौंसिल के पहले भारतीय उपाध्यक्ष भी थे और 1920 में लीग ऑफ़ नेशन की पहली अस्मेंबली में भारत की नुमाइंदगी की थी। वैसे सर अली इमाम को 1920 में “बिहार एंड उड़ीसा” प्रांत का पहला राज्यपाल भी नियुक्त होना था, लेकिन उससे पहले वो निज़ाम के प्रधानमंत्री बना दिए गए, तो लार्ड एसपी सिन्हा को ये पद मिला। उससे पहले बिहार में लेफ़्टिनेंट गवर्नर होते थे और सर अली इमाम उसके एक्ज़िक्यूटिव कौंसिल के भी मेंबर थे। सर अली इमाम बिहार प्रांतीय सम्मेलन के पहले अध्यक्ष भी थे। आपने ही दिल्ली को वापस से भारत की राजधानी और पटना को बिहार की राजधानी बनवाने में अहम योगदान दिया था।

