नीट पेपर लीक को लेकर हुए आंदोलन के सबक

Archana Ekka
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दिनेश श्रीनेत

जंतर-मंतर पर युवाओं आंदोलन से कुछ हासिल हो या न हो, यह आंदोलन ही अपने में एक हासिल है। इसने सब कुछ बदल दिया है, हकीकत को सिर के बल लाकर खड़ा कर दिया है। इससे चीजें सीधी दिखाई देने लगी हैं, जो अब तक उलटी-पुलटी दिख रही थीं। इस आंदोलन के सबक याद रखने होंगे ताकि आने वाले समय में हम एक स्वाभिमानी नागरिक की तरह जी सकें।
तो ये हैं कुछ सबक…

1. देखते-देखते एक पीढ़ी बड़ी हो गई है, अपने फैसले लेने और अपनी बात करने का उसका अंदाज़ अलग है, अगर उसके तौर-तरीके देखकर हमें और आपको हैरानी हो रही है तो सिर्फ इसलिए कि वह मुख्यधारा का हिस्सा नहीं थी। वह एक अंडरकवर कल्चर का हिस्सा थी, मगर वह कल्चर एक ऐसा बिरवा था जिसकी जड़ें फैलती जा रही थीं, और अंदर ही अंदर एक-दूसरे से जा मिलीं। इसके पास सबसे बड़ी ताकत क्या है? इसकी सबसे बड़ी ताकत है, इसका आत्मविश्वास, यह पारंपरिक सत्ता और संस्थानों में यकीन नहीं रखती है, बल्कि उन पर प्रश्न उठाने की प्रवृत्ति रखती है। हम और आप ऐसा नहीं कर पाते थे, हमें लगता था कि ये बड़े हैं, वरिष्ठ हैं तो कुछ सोच-समझकर ही कह रहे होंगे, ये जेनरेशन कहती है, फैक्ट्स लाओ, रिसर्च कहां हैं, तुम्हारे कहने से हम क्यों यकीन करें?

2. भारत आंदोलनों का देश रहा है, कभी इस प्रवृति का एक लंबे-चौड़े भाषण में ‘आंदोलन जीवी’ कहकर उपहास उड़ाने की कोशिश की गई थी, गुरूर में डूबी सत्ता ने इस तरह हालात के धूल चाटकर खड़ी जनता के स्वाभिमान का मज़ाक बनाया था, मगर आंदोलन हमारी नसों में बहता है। अपने अस्तित्व और अपनी गरिमा के लिए एकजुट नागरिकों को काबू में लाने के सारी रणनीति धरी की धरी रह गई, जब इस आंदोलन ने अपना डीएनए ही बदल डाला। यह दशकों से चली आने वाली भाषणबाजी और नारे नहीं थे, यहां एक खिलंदड़ापन था, एक ऐसा खिलंदड़ापन, जिससे पार पाना मुश्किल था। उसके पास उपहास की ताकत था, उसे घटनाओं को प्रतीकों में बदलना और उसे एक वायरल हो जाने वाले संदेश में बदलना आता था। उसने होश संभालने के साथ यही किया था। जिन जेन ज़ी बच्चों ने अपनी टीनएज के गई घंटे वीडियो गेम में लगाए थे, उन्होंने जंतर-मंतर और गांधी मैदान को एक वीडियो गेम में बदल दिया।

3. इस आंदोलन का सबसे बड़ा सबक यह है कि इसने साबित कर दिया कि मुख्यधारा मीडिया पूरी तरह से अप्रासंगिक हो चुका है, वह अपनी क्रेडिबिलिटी खो चुका है, इसलिए जो गिने-चुने कॉरपोरेट, औद्योगिक घराने इन्हें चलाए रखने और इनमें चाकरी करने वालों की भारी-भरकम सैलरी की व्यवस्था में लगे हैं, उन्हें भी फंडिंग बंद कर देनी चाहिए, शुद्ध धंधे की बात समझ में आती हो तो उनके कारोबार को लाखों-करोड़ों फॉलोअर्स वाले ये इन्फ्लूएंसर और कंटेंट क्रिएटर ज्यादा लाभ पहुँचाएंगे, इन चैनलों को पूरी तरह से सरकारी भीख पर निर्भर कर देना चाहिए, जिन टीवी चैनलों या मीडिया से आप असहमत हों, उसे देखना बंद करें। उन्हें अपनी स्वाभाविक मौत मरने दें। खर्च में आ रही रकम मीडिया के छोटे संस्थानों की मदद में लगाएँ।

4. इस आंदोलन ने बताया कि एक सीमा के बाद डर ताकत में बदल जाता है। पहले हम डरे तो हमें और डराया गया, हम और ज्यादा डरे, हमें और और ज्यादा डराया गया, और फिर एक दिन हमने डरना बंद कर दिया। हमें लगने लगा कि इससे ज्यादा डरना हमारी मानवीय क्षमता से बाहर है। जब हम डरना बंद करते हैं तो डराने वाली सत्ताएं बहुत कमज़ोर और हास्यास्पद हो जाती हैं। ओडिसी के उस राक्षस की तरह जिसकी इकलौती आँख ओडीसियस फोड़ देता है, और फिर सत्ताएं अपनी विशाल काया का बोझ नहीं संभाल पातीं, वे अपना ही संतुलन नहीं संभाल पातीं और गिरते पड़ते ज़मींदोज़ हो जाती हैं।

5. यह आंदोलन बताता है कि आंदोलन सिर्फ नेताओं के दम पर नहीं चलता, बहुत से आंदोलन स्वतःस्फूर्त होते हैं और इस बार के मूवमेंट में हर आंदोलनकारी एक नेता है। इस आंदोलन की हर तस्वीर में एक भावी ली़डर छिपा हुआ है, जिसके भीतर नेतृत्व की क्षमता है, जो मूल्यों पर यकीन करता है, जिसे अपना हक पता है, और सबसे बढ़कर उसे परवाह नहीं है कि कोई उसे जज करेगा, और कोई खिताब देगा, उसके पास आंदोलन करने और बात कहने के अपने तरीके हैं। यह एक ऐसा आंदोलन था, जिसकी हर चिंगारी के भीतर बराबर एक दावानल महसूस होता रहा।

6. इस आंदोलन ने बताया है कि 12-14 साल पहले दिशा निर्धारित करने वाली देश की एक पूरी पीढ़ी अब अप्रासंगिक हो चुकी है। वे गोरिल्लों की तरह सिर्फ छाती पीट सकते हैं, मगर बदलती पीढ़ियों के लिए वे किसी बनमानुस की तरह अबूझ हैं। बेबी बूमर जेनरेशन और ऐसे जेन एक्स और मिलेनियल्स जिसकी सोच और चाल-ढाल सठियाए जड़ और हठीले बूढ़ों जैसी है, वे खत्म हैं और वे अभी भी इस भ्रम में जी रहे हैं कि वे सत्ता और गतिविधियों का केंद्र हैं।

7. इस आंदोलन से हम सबसे बड़ा सबक सीखेंगे कि हर आंदोलन किसी बड़े बदलाव का सबब नहीं होता मगर बड़े बदलाव की ज़मीन जरूर तैयार करता है। बड़े बदलाव छोटी कोशिशों से संभव होते हैं। जिस समावेशी संस्कृति ने इस आंदोलन को सफल बनाया, उस संस्कृति को बचाए रखने के लिए हर स्तर कोशिश करनी होगी। हमें संविधान पर बात करनी होगी, मूल्यों पर बात करनी होगी, और स्वतंत्रता, स्वाभिमान के साथ जीना सीखना होगा। एक दिया बहुत नन्हीं सी आग से सैकड़ों दियों को जलाने और जगमगाने का हौसला रखता है। हमें सिर्फ लौ को जलाए रखना है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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अर्चना एक्का को पत्रकारिता का दो वर्ष का अनुभव है। उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत इंटर्नशिप से की। इस दौरान उन्होंने झारखंड उजाला, सनमार्ग और इम्पैक्ट नेक्सस जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया। इन संस्थानों में उन्होंने रिपोर्टर, एंकर और कंटेंट राइटर के रूप में कार्य करते हुए न्यूज़ रिपोर्टिंग, एंकरिंग और कंटेंट लेखन का अनुभव प्राप्त किया। पत्रकारिता के क्षेत्र में वह सक्रिय रूप से काम करते हुए अपने अनुभव को लगातार आगे बढ़ा रही हैं।