

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को उस जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें केंद्र सरकार और अन्य संबंधित पक्षों को यह निर्देश देने का अनुरोध किया गया था कि देशभर के पेट्रोल पंप पर पेट्रोल में मौजूद एथनॉल की सटीक मात्रा अनिवार्य रूप से बतायी जाए। न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की पीठ ने कहा कि वह संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इस जनहित याचिका पर सुनवाई नहीं करेगी। अनुच्छेद 32 नागरिकों को सीधे उच्चतम न्यायालय का रुख करने का अधिकार देता है। पीठ ने याचिकाकर्ता नरेंद्र कुमार गोस्वामी से कहा कि वह राहत के लिए संबंधित क्षेत्राधिकार वाले उच्च न्यायालय का रुख कर सकते हैं। केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने कहा कि यह एक तरह की परोक्ष/प्रतिनिधि याचिका है, क्योंकि इसी तरह के मुद्दे से जुड़ी एक याचिका को अदालत पहले ही खारिज कर चुकी है। अटॉर्नी जनरल ने कहा, ‘‘याचिकाकर्ता चाहता है कि भारत सरकार उसके प्रति जवाबदेह हो।’’





गोस्वामी ने दलील दी कि उन्हें यह जानने का अधिकार है कि पेट्रोल पंप पर उन्हें दिए जा रहे पेट्रोल में कौन-कौन से घटक और कितनी मात्रा में मौजूद हैं। उन्होंने कहा, ‘‘सिर्फ मुझे ही नहीं, बल्कि आम नागरिकों को भी यह जानकारी दी जानी चाहिए कि उन्हें दिए जा रहे ईंधन में क्या-क्या शामिल है।’’ उन्होंने कहा कि रसीद में एथनॉल की मात्रा का कोई उल्लेख नहीं होता। गोस्वामी ने दलील दी कि अटॉर्नी जनरल ने पिछली सुनवाई के दौरान एथनॉल मिश्रण कार्यक्रम को एक ‘प्रयोग’ बताया था। उन्होंने कहा कि बाद में सरकार ने स्पष्टीकरण जारी कर ऐसी कोई बात कहे जाने से इनकार किया। पीठ के समक्ष पेश हुए गोस्वामी से शीर्ष अदालत ने कहा कि वह अपनी दलीलें उच्च न्यायालय के सामने रखें।
गोस्वामी ने यह निर्देश देने का भी अनुरोध किया है कि ईंधन के हर बिल पर बेचे गए पेट्रोल में एथनॉल का प्रतिशत स्पष्ट और पढ़ने योग्य तरीके से दर्ज किया जाए। याचिका में यह भी अनुरोध किया गया कि केंद्र सरकार और अन्य संबंधित पक्ष एक निश्चित समयसीमा के भीतर वाहन के हिसाब से ईंधन की अनुकूलता का एक आधिकारिक और सार्वजनिक डेटाबेस तैयार करके प्रकाशित करें। यह डेटाबेस निर्माता कंपनी, मॉडल, इंजन के प्रकार और निर्माण वर्ष के आधार पर खोजने योग्य हो तथा इसमें यह बताया जाए कि अलग-अलग वाहनों के लिए एथनॉल के विभिन्न मिश्रण उपयुक्त हैं या नहीं।
याचिका में एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति गठित करने का भी अनुरोध किया गया। इसमें पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय, भारतीय मानक ब्यूरो के प्रतिनिधियों के साथ-साथ स्वतंत्र ऑटोमोबाइल इंजीनियरों और अन्य विशेषज्ञों को शामिल करने का अनुरोध किया गया है। इस समिति से मौजूदा वाहनों में ई20 ईंधन (20 प्रतिशत एथनॉल मिश्रित पेट्रोल) की वास्तविक परिस्थितियों में अनुकूलता की जांच कर इस संबंध में एक सार्वजनिक रिपोर्ट पेश करने का अनुरोध किया गया है।
याचिका में कहा गया है कि समिति को अपनी रिपोर्ट में ई20 के ईंधन दक्षता, इंजन की उम्र/टिकाऊपन, रखरखाव की लागत, वाहन की वारंटी और बीमा पर पड़ने वाले प्रभाव का भी आकलन करना चाहिए। इसके अलावा, समिति को इसके कुल पर्यावरणीय प्रभाव की भी जांच करनी चाहिए, जिसमें वाहनों से निकलने वाला धुआं और एथनॉल के उत्पादन में होने वाली पानी की खपत शामिल है। याचिका में एथनॉल मिश्रण कार्यक्रम से जुड़ी खाद्य सुरक्षा संबंधी चिंताओं और खाद्य या पशु आहार के लिए इस्तेमाल होने वाले संसाधनों को एथनॉल उत्पादन में प्रयोग करने से जुड़ी आशंकाओं का भी अध्ययन करने का अनुरोध किया गया है।
