
दयानंद राय
रांची : इस पहाड़ की खूबसूरती अंग्रेजों को भी भा गई थी। यहां शांति इतनी थी कि उनका मन लगने लगा। अंग्रेज इस पहाड़ी के प्राकृतिक वातावरण से काफी प्रभावित थे। जब भी उन्हें घूमना होता तो अंग्रेजी राज में रांची में रह रहे अंग्रेज अफसर यहां आते और यहां सुकून महसूस करते।अंग्रेजों को यह पहाड़ इतना पसंद आया कि उन्होंने पालकोट के राजा के नाम पर इसका नाम पालकोट पार्क रख दिया। यहां एक खूबसूरत पार्क में अंग्रेज वक्त बिताया करते थे। इस समय रांची का पहाड़ी मंदिर शिवभक्तों की आस्था का केंद्र है, जो कभी पालकोट पार्क था। पर्यावरणविद डॉ नीतीश प्रियदर्शी ने बताया कि दस्तावेजों के अनुसार 1908 में यहां रांची पहाड़ी के शिखर तक सड़क बनाने का काम शुरू किया गया था। इसके बाद 1908 में पालकोट के राजा ने यहां पर विकास के प्रयास किए। उस समय के डिप्टी कमिश्नर ने भी इस जगह को नगरपालिका क्षेत्र में शामिल किया था। इसी समय रांची शहर में व्यवस्था और विकास की योजनाएं तैयार की गईं। अंग्रेजों के समय में रांची शहर के विकास को लेकर कई कदम उठाए गए थे।
शिवभक्तों की आस्था का केंद्र रांची पहाड़ी कभी पालकोट पार्क था
बताया जाता है कि वर्ष 1910-11 में इसे पार्क के रूप में विकसित किया गया। इसका नाम रखा गया था पालकोट पार्क। इस नाम का शिलालेख मंदिर में सुरक्षित है। बताया जाता है कि शिलालेख पहाड़ी मंदिर के ऊपर एक चट्टान में स्थापित है। वहां तक पहुंचना थोड़ा मुश्किल है, इसलिए बहुत कम लोग इसे देख पाते हैं। पालकोट के राजा लाल कुंवर नाथ शाहदेव ने इस पार्क के निर्माण में सहयोग दिया था। मंदिर के करीब बने पार्क में यह शिलालेख सन 1911 का लगाया गया था। इस पहाड़ी को पालकोट पार्क के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया गया था। अंग्रेजों के समय में रांची शहर का प्रशासनिक विकास भी हुआ। इस पहाड़ी का सौंदर्य और प्राकृतिक वातावरण अंग्रेजों को बहुत पसंद था।
