
- आदिवासी समाज के उत्थान के लिए नौकरी से नौ साल पहले ही 1981 में वीआरएस ले लिया था
- क्षेत्र में जाने पर कार्यकर्ता उन्हें बिना खिलाए आने नहीं देते थे
- शिक्षक, सख्त और ईमानदार पुलिस अधिकारी के साथ जननेता के रूप में निभायी गयी अपनी हर भूमिका को उन्होंने बेहतरीन तरीके से जिया
दयानंद राय
जननायक बाबा बंदी उरांव 1956 में बीपीएससी के जरिये पुलिस सेवा में आये थे, इससे पहले वे गोविंदपुर हाई स्कूल में शिक्षक की भूमिका में थे। पुलिस सेवा में आने के बाद उनकी पहचान सख्त पुलिस अधिकारी की थी जिससे अपराधी कांपते और थर्राते थे, गरीब और वंचित तबके को उसका हक दिलाने के सामंती ताकतों से भिड़ जाते थे। लेकिन यही सख्त पुलिस अधिकारी जब नौकरी से वीआरएस लेकर राजनीति में आया तो वह सहृदय राजनेता बना और अपने काम से ऐसी छाप छोड़ी की जननायक बन गए। हर गली-हर मोहल्ले में वे विधायक के रूप में जाते थे और सबकी समस्याएं सुनकर उसका त्वरित निदान करते थे।
अपने समाज को देखकर कुछ कर गुजरने का जज्बा उनमें हिलोरें मार रहा था

उन्हें याद करते हुए वरिष्ठ पत्रकार किसलय बताते हैं कि सख्त पुलिस अधिकारी से लेकर सहृदय राजनेता तक उनकी कथा अंतहीन है। युवा बंदी उरांव 1956 में बीपीएससी के जरिये डीएसपी बने। इसके बाद उन्हें आइपीएस के रूप में प्रोन्नति मिली। बिहार के सीतामढ़ी, दरभंगा और चाईबासा में वे एसपी रहे। इतने से ही उन्हें संतुष्टि नहीं मिली, अपने समाज को देखकर कुछ कर गुजरने का जज्बा उनमें हिलोरें मार रहा था तो नौ साल पहले ही 1981 में वीआरएस ले लिया।
इसके बाद बाबा बंदी उरांव कांग्रेस के हो गए। उनके काम और आदिवासी समाज की उनकी उन्नति के जज्बे से प्रभावित होकर कांग्रेस आलाकमान ने उन्हें छोटानागपुर संथालपरगना क्षेत्रीय कांग्रेस कमिटी की कमान थमा दी। तब झारखंड का यह हिस्सा एकीकृत बिहार का इलाका हुआ करता था। बंदी उरांव चार बार सिसई विधानसभा से विधायक चुने गए। एक बार मंत्री भी। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के उपाध्यक्ष रहे। लेकिन उनके अंदर ग्राम स्वराज की स्थापना का जोश हिलोरे मार रहा था। इसमें उन्हें बीडी शर्मा का साथ मिला और
आदिवासी समाज का ग्राम स्वशासन का सपना साकार हुआ।
बाबा बंदी उरांव को याद करते हुए कांग्रेसी नेता पतितपावन शाही बताते हैं कि उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में जातिवाद, संप्रदायवाद और स्वार्थवाद को कभी हावी नहीं होने दिया। उनका एक ही मकसद था और वो था सर्वे भवंतु सुखिन:। उन्होंने कभी वोट की राजनीति नहीं की और गरीब और अमीर को एक नजर से देखा करते थे।
कार्यकर्ता कभी बिना खिलाए आने नहीं देते थे
जननायक बाबा बंदी उरांव अपने क्षेत्र में पुरानी जीप से जाया करते थे। क्षेत्र में लोगों का उनके प्रति प्यार को इसी से समझा जा सकता है कि वे जहां भी जाते थे कार्यकर्ता उन्हें भोजन और नाश्ता-पानी के नहीं आने देते थे। इस दौरान वो लोगों की समस्याओं को गंभीरता से सुनते थे। लोगों के लिए उनका फोन और कागज-कलम हमेशा उनके हाथ में हुआ करता था।
दादा खाने और खिलाने के बेहद शौकीन थे। रजौली का पेड़ा, सेव भुजिया और गुड़ की बालूशाही उन्हें बेहद पसंद थी। वे खुद को इसे खाते ही कार्यकर्ताओं को भी खिलाते थे।जहां तक मैं समझता हूं पेसा कानून और पंचायती राज अधिनियम झारखंड में उन्हीं के अथक प्रयास का प्रतिफल है। अगर बाबा बंदी उरांव नहीं होते तो संविधान से प्रदत पेसा कानून गांव-गांव में आंदोलन नहीं बनता। जनसेवा के लिए बाबा बंदी उरांव अमर रहेंगे।
