
Netflix पर एक फिल्म आयी है कर्तव्य। फिल्म का एक किरदार सोशल मीडिया पर नकारात्मक संदर्भ में सुर्खियों में हैं। फिल्मों की रिव्यू लिखने, फिल्मस्टार के इंटरव्यू करने से फिल्म में एक्टिंग करने वाले सौरभ द्विवेदी किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। प्रयोगधर्मिता उनकी पूंजी रही है। मुझे उनकी एक्टिंग को देखने से ज्यादा खुशी, उनको फिल्म की सीन में देख कर ही हुई। लोगों ने फिल्म में भी सौरभ द्विवेदी के ही रूप में उनको देखा, यह उनकी पेशेगत लोकप्रियता की वजह से भी हुआ।
मैंने पत्रकारिता इंडस्ट्री में काम की शुरुआत एक इंटर्न के तौर पर ‘आज तक डिजिटल से की थी। यह एक अनौपचारिक शुरुआत जैसा मामला था। IIMC में क्लास करते हुए ही यह मौका मिल गया था। मुझे मौका देने वाले इंसान ‘सौरभ द्विवेदी सौरभ द्विवेदी भैया थे। एक महीने की इंटर्नशिप के बाद वहीं मेरी नौकरी भी हो जाती। सुरेश सर से इस विषय पर बात हो गयी थी, लेकिन दुुर्भाग्य से हमारे विभागाध्यक्ष को यह बात जची नहीं, क्योंकि आज तक डॉट कॉम वाले संस्थान में प्लेसमेंट ड्राइव के लिए नहीं आये थे। विभागाध्यक्ष महोदय ने एक साथी से कह दिया कि सुप्रियो मेरा विद्यार्थी रहा है, अगर मैं चाह लूंगा, तो क्या वे नौकरी पर रख लेंगे। खैर, लगभग 20 दिन वहां जाने के बाद हमने जाना छोड़ दिया, क्योंकि डेस्टिनी को कुछ और मंजूर था। जबकि मेरा आइ कार्ड और एडिडेट स्टोरी में नाम जाना भी शुरू हो गया था।
सौरभ भैया को बुरा लगा ही होगा। उन्होंने मुझे मौका दिया था। हालांकि, उन्होंने कहा नहीं, बस यही कहा कि नहीं करना था काम तो आकर ID कार्ड खुद जमा कर देते, बिना बताए ऐसे अचानक आना नहीं छोड़ना चाहिए था। हमने साथी हर्षिता के जरिये ID कार्ड भिजवा दी थी। खैर, मैं जब आज तक डॉट इन में इंटर्न के तौर पर गया था, तो सौरभ द्विवेदी वेबसाइट के असिस्टेंट एडिटर होने के साथ वेबसाइट के लिए फिल्म रिव्यू किया करते थे। उस समय लल्लनटॉप का जन्म नहीं हुआ था। सुरेश सर एडिटर के रोल में थे। कमलेश सर टीम के बॉस थे। सौरभ भैया को उस समय जितना समझा, फिल्म और किताबें उनके जीवन के दो सबसे प्रमुख अवयव थे। वह कहते – गुरु सप्ताह में एक किताब निबटाने की आदत डाल लो।
एक दिन IIMC में एलुमनाई एसोसिएशन का कोई कार्यक्रम था और उस कार्यक्रम में वह भी आये थे। मैंने ऐसे ही उनसे कह दिया- भैया आप कब किताब लिख रहे हैं? उन्होंने कहा- मुझे तुम्हारी बात अच्छी नहीं लगी, तुमको अपना शुभचिंतक समझता था, पर तुमने ठीक बात नहीं की। इतनी अच्छी किताबें लिखी हुईं हैं पहले से, उन्हें पढ़ लेना ज्यादा जरूरी है। उनकी यह बात मुझे अच्छी लगी। जब नाम कमाने के दौर में किताबें लिख लेना प्रोफाइल को मजबूत करने का हिस्सा हो गया है। अब तक सौरभ भैया ने कोई किताब नहीं लिखी है। चाहते तो पांच किताबें लिख चुके होते। मुझे नहीं लगता है कि फिल्म में अभिनय के लिए भी उन्होंने अपनी तरफ से कोई प्रयास किया होगा। फिल्म खुद उन तक चल कर आयी होगी। रोल उन्हें दिया गया होगा। अब सौरभ द्विवेदी का पता इंडियन एक्सप्रेस हिंदी हो गया है, लोगों का प्यार वो वहीं से पायेंगे।

