
शुभनीत कौशिक
जेएनयू छोड़ने के बाद जेएनयू की जो जगहें सबसे ज्यादा याद आती हैं उनमें से एक है जेएनयू की सेंट्रल लाइब्रेरी। जेएनयू में लाइब्रेरियाँ तो और भी थीं, जैसे एक्ज़िम लाइब्रेरी, डीएसए लाइब्रेरी। मगर सेंट्रल लाइब्रेरी मुझे बहुत अज़ीज़ थी। नौ मंजिलों वाली यह लाइब्रेरी हमारे दैनंदिन जीवन का अहम हिस्सा थी। लाइब्रेरी पहुंचना, किताबें पढ़ना, दोस्तों से मिलना-जुलना, गोपालन की कैंटीन में चाय की चुस्कियों के साथ गपशप – सेंट्रल लाइब्रेरी एक तरीके से जेएनयू के छात्र-जीवन की गतिविधियों के केंद्र में थी।
जुलाई 2012 में जेएनयू में प्रवेश में ठीक अगले ही दिन राजनीतिविज्ञान के अपने मित्र मनीष के साथ इस लाइब्रेरी में पहली बार जाना हुआ। और वह पहली नजर में हुआ प्यार साबित हुआ। प्यार जिसकी याद ज़िंदगी भर बनी रहेगी। इस लाइब्रेरी में जिन जगहों पर मैंने सबसे ज्यादा वक्त बिताया, वे थीं – लाइब्रेरी की दूसरी मंजिल, जहां समाज-विज्ञान, राजनीति और इतिहास की किताबें थीं। चौथी मंजिल जहां अंग्रेजी साहित्य, विश्व-साहित्य और यूरोपीय भाषाओं तथा भाषा विज्ञान की पुस्तकें थीं और मेरी पसंदीदा पांचवी मंजिल जहां जेएनयू के अपने आखिरी दिनों में मैंने अपना अधिकांश समय बिताया। उस मंजिल पर हिंदी, उर्दू, मराठी, बांग्ला आदि भाषाओं की किताबें रखी थीं।
जेएनयू लाइब्रेरी का स्टाफ और उसका सहयोगी रवैया भी बार-बार याद आता है। जब मैं जेएनयू दाखिल हुआ उसे समय रमेश चंद्र गौड़ जेएनयू के लाइब्रेरियन थे, वे आजकल इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स के लाइब्रेरियन हैं। गौड़ साहब ने जेएनयू लाइब्रेरी में छात्रों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने, पठन-पाठन का माहौल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। सुधीर सोपोरी तब कुलपति हुआ करते थे और कभी-कभार पैदल घूमते हुए वह लाइब्रेरी और उसके आसपास छात्रों से बातें करते हुए दिख जाया करते थे।
लाइब्रेरी में पत्रिकाओं और अखबारों का सेक्शन बहुत ही समृद्ध था। जे-स्टोर जैसे ऑनलाइन संग्रहों से अलग जर्नल्स की ज़िल्दबंद प्रतियों को खोजने और उन्हें अपने हाथ में लेकर देखने-पढ़ने का एक अलग ही सुख था, जो इस लाइब्रेरी के जर्नल सेक्शन में मिलता था। पास्ट एंड प्रेजेंट, इंडियन इकोनामिक एंड सोशल हिस्ट्री रिव्यू, स्टडीज इन हिस्ट्री, मॉडर्न एशियन स्टडीज के पुराने अंकों की प्रतियों को पढ़ने की याद अभी भी ताज़ा हैं। परीक्षा की घड़ियां जब नजदीक आतीं तो हम लोग छठवीं मंजिल हुआ करते जहां टेक्सबुक सेक्शन हुआ करता था और उसके ठीक सामने पीसी जोशी आर्काइव, जिसमें समकालीन इतिहास से जुड़ी महत्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध होती थी।
जेएनयू की लाइब्रेरी की खिड़कियों से कुतुब मीनार और मेहरौली की झलक, गर्मी के दिनों में आने वाली आँधियों में काँपती हुई लाइब्रेरी की खिड़कियाँ-दरवाज़े और धूल के बवंडर की याद अभी भी आती है। और याद आती है लाइब्रेरी की कमेटी रूम में होने वाली गोष्ठियों की, साहित्य अकादेमी की पुस्तक प्रदर्शनियों की भी। ऐसी ही एक गोष्ठी में देवशंकर नवीन द्वारा संपादित राजकमल चौधरी रचनावली पर हुई चर्चा में केदारनाथ सिंह, अपूर्वानंद आदि को सुनने का अवसर मिला था। एम्स और दूसरे संस्थानों द्वारा जेएनयू लाइब्रेरी को भेंट में दी गई पुस्तकों को भी लाइब्रेरी द्वारा छात्रों के लिए चुनने और उन्हें अपने साथ ले जाने का विकल्प दिया जाता था। ऐसे में मनपसंद किताबों को छांट कर ले जाने का अलग ही आनंद होता था।
जेएनयू की इस लाइब्रेरी में बहुत-सी चौंकाने वाली किताबें भी मिला करती थी। जैसे हिंदी के सेक्शन में मुझे दिवंगत कवि गोरख पांडेय के निजी-संग्रह की किताबें मिली थीं, जो उनके पिता ने उनकी मृत्यु के बाद जेएनयू लाइब्रेरी को दे दी थीं। उनकी किताबों में कथाकार संजीव के उपन्यास ‘किशनगढ़ के अहेरी’ की वह प्रति भी शामिल थी, जो उन्होंने गोरख पांडेय को अपने हस्ताक्षर के साथ भेंट की थी।
इसी तरह मुझे इतिहासकार दामोदर धर्मानंद कोसंबी के संग्रह की पुस्तकों की याद आती है, जिसमें काशी प्रसाद जायसवाल की ‘हिंदू पालिटी’ की भी प्रति थी। इस किताब के हाशिए पर खुद कोसंबी के हस्तलेख थे, उनकी आलोचना से भरी हुई तीखी टिप्पणियां थीं।
जेएनयू लाइब्रेरी की बात हो तो गोपालन की कैंटीन की चर्चा ना हो यह भला कैसे संभव है और साथ ही पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस और दादा की किताबों का स्टाल भी हम लोगों के लिए दिलचस्पी का सबब हुआ करता था। आज जेएनयू छोड़े हुए 9 साल बीतने को आए हैं लेकिन यह लाइब्रेरी हर रोज याद आती है।

