
विवेकानंद कुशवाहा
ममता बनर्जी कह रही हैं कि वह चुनाव हारी नहीं, उनको हराया गया है। सवाल यह है कि ममता दीदी को पश्चिम बंगाल की राजनीति का क्वीन बनाया किसने? कांग्रेस की नेता रहते हुए ममता बनर्जी वह मुकाम नहीं हासिल कर पातीं, जिसे पाने की उनकी इच्छा थी। उन्हें अक्सर लगता था कि कांग्रेस का नेतृत्व वामपंथियों के प्रति नरम रुख रखता है। यहीं ममता दीदी में भाजपा/संघ को एक अवसर दिखा। वर्ष 1990 के दशक से ही ममता दीदी को भाजपा ने पीछे से मदद करना शुरू किया। उस समय भाजपा/संघ खुद से बंगाल की राजनीति में बड़ा हस्तक्षेप करने की स्थिति में नहीं थी। उनके लोग थे जमीन पर, लेकिन उस समय बंगाल में वामपंथ का उत्कर्ष काल था। भाजपा ज्यादा कोशिश करती तो कूचल दी जाती।
वर्ष 1997 में कांग्रेस से अलग होने के बाद ममता दीदी ने 1 जनवरी, 1998 को अपनी नयी पार्टी ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ (टीएमसी) का गठन किया। उनका मुख्य उद्देश्य बंगाल की जनता को वामपंथी शासन के खिलाफ एक मजबूत और आक्रामक विकल्प देना था। उनका नारा ‘मां, माटी, मानुष’ काफी लोकप्रिय हुआ। वामपंथियों को हराने के अपने एकल लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, ममता बनर्जी ने 1999 में वाजपेयी जी के नेतृत्व वाले भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के साथ हाथ मिलाया। वह केंद्र सरकार में रेल मंत्री भी बनीं। यह वो दौर था, जब पहली बार खुलेतौर पर टीएमसी और भाजपा/संघ के बीच एक सामरिक तालमेल दिखा।
उस समय बंगाल में संघ और भाजपा का मुख्य लक्ष्य भी वामपंथी किले को ध्वस्त करना था। चूंकि, ममता बनर्जी वामपंथ के खिलाफ सबसे मजबूत चेहरा बन कर उभरी थीं, इसलिए भाजपा और संघ परिवार के कैडर ने जमीनी स्तर पर (प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से) वाम-विरोधी वोटों को एकजुट करने में ममता का रणनीतिक समर्थन किया, ताकि सीपीएम को हराया जा सके।
जैसे-जैसे बंगाल में सीपीएम की पकड़ कमजोर होती गयी, ममता दीदी की नजर बीजेपी से अलग मुस्लिम वोट बैंक की तरफ चली गयी। ममता बनर्जी को एहसास था कि यदि वह भाजपा के साथ बनी रहीं, तो मुसलमानों का वोट नहीं हासिल कर पायेंगी और अगर सीपीएम सत्ता से हटती भी है, तो उनको भाजपा के साथ सत्ता शेयर करनी होगी।
ममता बनर्जी ने खुद को एनडीए से अलग कर लिया, ताकि उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि बनी रहे। इसके बाद, उन्होंने 2011 में वाम मोर्चे के 34 साल पुराने शासन को उखाड़ फेंका और पूर्ण बहुमत के साथ मुख्यमंत्री बनीं। भाजपा को शुरू में ममता दीदी के शासन से बहुत दिक्कत नहीं थी, लेकिन अल्पसंख्यक तुष्टीकरण में ममता दीदी नये रिकॉर्ड बनाने लगी। फिर जिस भाजपा/संघ ने ममता को बंगाल की राजनीति का दीदी बना दिया था, धीरे से उसके पतन की पटकथा लिखनी शुरू कर दी।
2014 में भाजपा के नये उदय के बाद भी भाजपा ने 2016 के चुनाव में वेट एंड वाच किया, क्योंकि उनको डर था कि उनके मजबूती से लड़ने से कहीं वोटों का बिखराव न हो और वाम फ्रंट सत्ता में वापसी न कर ले। ममता दीदी के खिलाफ बंगाल में माहौल तो जल्दी ही आमलोगों में बन गया था। क्योंकि सीपीएम काल की गुंडागर्दी से अधिक गुंडागर्दी इनके काल में होने लगी थी। वर्ष 2021 में ही इनकी हार हो जाती, लेकिन उस समय तक भाजपा बाहरी पार्टी की तरह थी और बांग्ला अस्मिता (जय बांग्ला) की काट भाजपा के पास नहीं थी। बंगाल के लोगों ने फिर ममता दीदी को चुन लिया, लेकिन 2026 तक पद्मा नदी में बहुत पानी बह चुका था।
वोट बैंक को तुष्ट करने के लिए ममता दीदी ने सही में हुए घुसपैठ तक को इग्नोर किया। भाजपा जानती थी कि ममता दीदी का डर उनसे ऐसी गलतियां करवायेंगी। ममता दीदी अल्पसंख्यक वोट को अपनी सत्ता की इंश्योरेंस समझने लगी थी। उसे बचाने के लिए हर यत्न करती थीं। बांग्लादेश की घटना ने पश्चिम बंगाल के हिंदुओं को ध्रुवीकृत करना शुरू कर दिया। इस दौरान भाजपा बंगाल में मुख्य विपक्षी पार्टी बन चुकी थी।
पश्चिम बंगाल में दलितों की बड़ी आबादी है, उसमें भाजपा चुपके-चुपके अपनी पैठ बनाती रही। अंततः 2026 में सफल चुनावी प्रबंधन करते हुए भाजपा ने ममता दीदी को कस कर पटकनी दे दी। दलित आबादी बाहुल्य सीटों पर भाजपा को बड़ी जीत मिली है। कुल मिलाकर जिस सीपीएम को मात देने के लिए भाजपा/संघ ने ममता दीदी को बंगाल का आयकन बनाया था, फाइनली उसको भी फिनिश कर दिया। इस तरह भाजपा की 74 साल पुरानी इच्छा पूरी हो गयी।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

